राज्यसभा की भूमिका
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राज्यसभा की भूमिका

भारत की राज्य सभा क्या :-
राज्य सभा भारतीय लोकतंत्र की ऊपरी प्रतिनिधि सभा है। लोकसभा निचली प्रतिनिधि सभा है। राज्यसभा में 245 सदस्य होते हैं। जिनमे 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति के द्वारा नामांकित होते हैं। इन्हें नामित सदस्य’ कहा जाता है। अन्य सदस्यों का चुनाव होता है। राज्यसभा में सदस्य 6 साल के लिए चुने जाते हैं, जिनमे एक-तिहाई सदस्य हर 2 साल में सेवा-निवृत होते हैं।
किसी भी संघीय शासन में संघीय विधायिका का ऊपरी भाग संवैधानिक बाध्यता के चलते राज्य हितों की संघीय स्तर पर रक्षा करने वाला बनाया जाता है। इसी सिद्धांत के चलते राज्य सभा का गठन हुआ है। इसी कारण राज्य सभा को सदनों की समानता के रूप में देखा जाता है जिसका गठन ही संसद के द्वितीय सदन के रूप में हुआ है। राज्यसभा का गठन एक पुनरीक्षण सदन के रूप में हुआ है जो लोकसभा द्वारा पास किये गये प्रस्तावों की पुनरीक्षा करे। यह मंत्रिपरिषद में विशेषज्ञों की कमी भी पूरी कर सकती है क्योंकि कम से कम 12 विशेषज्ञ तो इस में मनोनीत होते ही हैं। आपातकाल लगाने वाले सभी प्रस्ताव जो राष्ट्रपति के सामने जाते हैं, राज्य सभा द्वारा भी पास होने चाहिये। जुलाई 2018 से, राज्यसभा सांसद सदन में 22 भारतीय भाषाओं में भाषण कर सकते हैं क्योंकि ऊपरी सदन में सभी 22 भारतीय भाषाओं में एक साथ व्याख्या की सुविधा है।
भारत के उपराष्ट्रपति (वर्तमान में वैकेया नायडू) राज्यसभा के सभापति होते हैं। राज्यसभा का पहला सत्र 13 मई 1952 को हुआ था।

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भारत की राजसभा की संरचना/संख्या :-
संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है, जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाते हैं और 238 सदस्य राज्यों के और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं। तथापि, राज्य सभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है, जिनमें से 233 सदस्य राज्यों और संघ राज्यक्षेत्र दिल्ली तथा पुडुचेरी के प्रतिनिधि हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित हैं। राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है।

भारत की राजसभा की पात्रता :-
संविधान के अनुच्छेद 84 में संसद की सदस्यता के लिए अर्हताएं निर्धारित की गई हैं। राज्य सभा की सदस्यता के लिए अर्ह होने के लिए किसी व्यक्ति के पास निम्नलिखित अर्हताएं होनी चाहिए-
1) उसे भारत का नागरिक होना चाहिए और निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ लेना चाहिए या प्रतिज्ञान करना चाहिए और उस पर अपने हस्ताक्षर करने चाहिए;
2) उसे कम से कम तीस वर्ष की आयु का होना चाहिए;
3) उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं होनी चाहिए जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त विहित की जाएं।

भारत की राजसभा का संघीय स्वरूप :-
राज्य सभा का गठन ही राज्य परिषद के रूप में संविधान के संघीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व देने के लिये हुआ था
राज्य सभा के सद्स्य मंत्रि परिषद के सदस्य बन सकते है जिससे संघीय स्तर पर निर्णय लेने में राज्य का प्रतिनिधित्व होगा
राष्ट्रपति के निर्वाचन तथा महाभियोग तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में समान रूप से भाग लेती है
अनु 249,312 भी राज्य सभा के संघीय स्वरूप तथा राज्यॉ के संरक्षक रूप में उभारते है
सभी संविधान संशोधन बिल भी इस के द्वारा पृथक सभा कर तथा 2/3 बहुमत से पास होंगे
संसद की स्वीकृति चाहने वाले सभी प्रस्ताव जो कि आपातकाल से जुडे हो भी राज्यसभा द्वारा पारित होंगे

भारत की राजसभा के गैर संघीय तत्व :-
संघीय क्षेत्रों को भी राज्य सभा में प्रतिनिधित्व मिलता है जिससे इसका स्वरूप गैर संघीय हो जाता है
राज्यों का प्रतिनिधित्व राज्यों की समानता के आधार पर नहीं है जैसा कि अमेरिका में है। वहाँ प्रत्येक राज्य को
सीनेट में दो स्थान मिलते है किंतु भारत में स्थानॉ का आवंटन आबादी के आधार पर किया गया है
राज्य सभा में मनोनीत सद्स्यों का प्रावधान है

भारत की राजसभा के चुनाव के कद्दावर प्रत्याशी :-
सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने 27 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है इनमें वित्त मंत्री अरुण जेटली, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत, मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला और रसायन राज्यमंत्री मनसुख भाई मंडाविया के नाम प्रमुख हैं
इसके अलावा अशोक वाजपेयी, विजय पाल सिंह तोमर, सकल दीप राजभर, अनिल जैन, हरनाथ सिंह यादव, जीवीएल नरसिम्हा राव, अनिल कुमार गर्ग आदि भी भाजपा प्रत्याशी हैं.
वहीं कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी, एल हनुमंथइया, सईद नसीर हुसैन, जीसी चंद्रशेखर, कुमार केतकर समेत कई अन्य उम्मीदवार चुनाव में उतरे हैं |

भारत की राजसभा की कितनी सीटों पर चुनाव :-
राज्यसभा में किस राज्य से कितने सांसद होंगे यह उस राज्य की जनसंख्या के हिसाब से तय किया जाता है |
राज्यसभा के सदस्‍य का चुनाव राज्‍य विधानसभा के चुने हुए विधायक करते हैं. प्रत्‍येक राज्‍य के प्रतिनिधियों की संख्‍या ज़्यादातर उसकी जनसंख्‍या पर निर्भर करती है.
इस प्रकार, उत्तर प्रदेश के राज्यसभा में 31 सदस्‍य हैं. जबकि अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड, मेघालय, गोवा, मिजोरम, सिक्‍किम, त्रिपुरा आदि छोटे राज्‍यों के केवल एक एक सदस्‍य हैं. लेकिन इसकी चुनावी प्रक्रिया बाकी सभी चुनावों से अलग होती है.
शुक्रवार को राज्यसभा के लिए हो रहे इस चुनाव की 58 सीटें 16 राज्यों से हैं. इसमें उत्तर प्रदेश की 10; बिहार और महाराष्ट्र की छह-छह; मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल की पांच-पांच; गुजरात और कर्नाटक की चार-चार; आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा और राजस्थान की तीन-तीन, झारखंड की दो, छत्तीसगढ़, हिमाचल, हरियाणा और उत्तराखंड की एक-एक सीट शामिल हैं |
इसके अलावा केरल की एक राज्यसभा सीट पर उपचुनाव होंगे यहां से सांसद वीरेंद्र कुमार ने इस्तीफा दे दिया था, जिनका कार्यकाल अप्रैल 2022 तक था |

भारत की राज्यसभा पहुंचने के लिए कितने वोट चाहिए :-
एक उम्मीदवार को चुने जाने के लिए न्यूनतम मान्य वोट चाहिए होते हैं. वोटों की गिनती सीटों की संख्या पर निर्भर करता है |
इसे समझने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण लेते हैं. यहां विधायकों की कुल संख्या 403 है. अब प्रत्येक सदस्य को राज्यसभा पहुंचने के लिए कितने विधायकों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए इसे कैसे निकाला जाता है यह तय करने के लिए कुल विधायकों की संख्या को जितने सदस्य चुने जाने हैं उसमें एक जोड़कर विभाजित किया जाता है |
इस बार यहां से 10 राज्यसभा सदस्यों का चयन होना है. इसमें 1 जोड़ने से यह संख्या 11 होती है. अब कुल सदस्य 403 हैं तो उसे 11 से विभाजित करने पर 36.66 आता है. इसमें फिर 1 जोड़ने पर यह संख्या 37.66 हो जाती है. यानी उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को 37 प्राथमिक वोटों की जरूरत होगी |
इसके अलावा वोट देने वाले प्रत्येक विधायक को यह भी बताना होता है कि उसकी पहली पसंद और दूसरी पसंद का उम्मीदवार कौन है. इससे वोट प्राथमिकता के आधार पर दिए जाते हैं. यदि उम्मीदवार को पहली प्राथमिकता का वोट मिल जाता है तो वो वह जीत जाता है नहीं तो इसके लिए चुनाव होता है |

भारत की राज्यसभा भंग नहीं होती :-
राज्यसभा के सभापति भारत के उपराष्ट्रपति होते हैं. इसके सदस्य छह साल के लिए चुने जाते हैं. इनमें से एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल प्रत्येक दो साल में पूरा हो जाता है. इसका मतलब है कि प्रत्येक दो साल पर राज्यसभा के एक तिहाई सदस्य बदलते हैं न कि यह सदन भंग होता है. यानी राज्यसभा हमेशा बनी रहती है |

भारत की राज्य सभा की विशेष शक्ति :-
एक परिसंघीय सदन होने के नाते राज्य सभा को संविधान के अधीन कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त हैं। विधान से संबंधित सभी विषयों/क्षेत्रों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया है-संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। संघ और राज्य सूचियां परस्पर अपवर्जित हैं-कोई भी दूसरे के क्षेत्र में रखे गए विषय पर कानून नहीं बना सकता।
तथापि, यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह कहते हुए एक संकल्प पारित करती है कि यह “राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन” है कि संसद, राज्य सूची में प्रमाणित किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद भारत के संपूर्ण राज्य-क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए उस संकल्प में विनिर्दिष्ट विषय पर विधि बनाने हेतु अधिकार-संपन्न हो जाती है। ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा परन्तु यह अवधि इसी प्रकार के संकल्प को पारित करके एक वर्ष के लिए पुन बढ़ायी जा सकती है।
यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह घोषित करते हुए एक संकल्प पारित करती है कि संघ और राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन किया जाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन है, तो संसद विधि द्वारा ऐसी सेवाओं का सृजन करने के लिए अधिकार-संपन्न हो जाती है।
संविधान के अधीन, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात की स्थिति में, किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की स्थिति में अथवा वित्तीय आपात की स्थिति में उद्घोषणा जारी करने का अधिकार है। ऐसी प्रत्येक उद्घोषणा को संसद की दोनों सभाओं द्वारा नियत अवधि के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। तथापि, कतिपय परिस्थितियों में राज्य सभा के पास इस संबंध में विशेष शक्तियाँ हैं। यदि कोई उद्घोषणा उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है अथवा लोक सभा का विघटन इसके अनुमोदन के लिए अनुज्ञात अवधि के भीतर हो जाता है और यदि इसे अनुमोदित करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा अनुच्छेद 352, 356 और 360 के अधीन संविधान में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर पारित कर दिया जाता है, तब वह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी।

भारत की राज्य सभा की वित्तीय मामलों :-
धन विधेयक केवल लोक सभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है। इसके उस सभा द्वारा पारित किए जाने के उपरान्त इसे राज्य सभा को उसकी सहमति अथवा सिफारिश के लिए पारेषित किया जाता है। ऐसे विधेयक के संबंध में राज्य सभा की शक्ति सीमित है। राज्य सभा को ऐसे विधेयक की प्राप्ति से चौदह दिन के भीतर उसे लोक सभा को लौटाना पड़ता है। यदि यह उस अवधि के भीतर लोक सभा को नहीं लौटाया जाता है तो विधेयक को उक्त अवधि की समाप्ति पर दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें इसे लोक सभा द्वारा पारित किया गया था। राज्य सभा धन विधेयक में संशोधन भी नहीं कर सकती; यह केवल संशोधनों की सिफारिश कर सकती है और लोक सभा, राज्य सभा की सभी या किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकेगी।
धन विधेयक के अलावा, वित्त विधेयकों की कतिपय अन्य श्रेणियों को भी राज्य सभा में पुर स्थापित नहीं किया जा सकता। तथापि, कुछ अन्य प्रकार के वित्त विधेयक हैं जिनके संबंध में राज्य सभा की शक्तियों पर कोई निर्बंधन नहीं है। ये विधेयक किसी भी सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं |

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