राजस्थान सहकारी बैंक, सहकारी बैंकों का उद्देश्य

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इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में सहकारी बैंकिंग प्रणाली और उसके महत्त्व पर चर्चा की गई है। साथ ही सहकारी बैंकिंग प्रणाली के समक्ष मौजूद चुनौतियों और उसके समाधान हेतु उपायों का भी उल्लेख किया गया है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।
राजस्थान सहकारी बैंक
सहकारी बैंक :- सहकारी बैंक का आशय उन छोटे वित्तीय संस्थानों से है जो शहरी और गैर-शहरी दोनों क्षेत्रों में छोटे व्यवसायों को ऋण की सुविधा प्रदान करते हैं, सहकारी बैंक आमतौर पर अपने सदस्यों को कई प्रकार की बैंकिंग और वित्तीय सेवाएँ जैसे- ऋण देना, पैसे जमा करना और बैंक खाता आदि प्रदान करते हैं, सहकारी बैंक उनके संगठन, उद्देश्यों, मूल्यों और शासन के आधार पर वाणिज्यिक बैंकों से भिन्न होते हैं, उल्लेखनीय है कि सहकारी बैंक का प्राथमिक लक्ष्य अधिक-से-अधिक लाभ कमाना नहीं होता, बल्कि अपने सदस्यों को सर्वोत्तम उत्पाद और सेवाएँ उपलब्ध कराना होता है, सहकारी बैंकों का स्वामित्व और नियंत्रण सदस्यों द्वारा ही किया जाता है, जो लोकतांत्रिक रूप से निदेशक मंडल का चुनाव करते हैं, ये भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा विनियमित किये जाते हैं एवं बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के साथ-साथ बैंकिंग कानून अधिनियम, 1965 के तहत आते हैं, सहकारी बैंक सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत किये जाते हैं।
राजस्थान सहकारी बैंक
सहकारी बैंक और वाणिज्यिक बैंक में अंतर :- वाणिज्यिक बैंक संयुक्त स्टॉक (Joint-Stock) बैंक हैं, जबकि सहकारी बैंक सहकारी संस्थाएँ होती हैं, वाणिज्यिक बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक के नियंत्रण के अधीन हैं। सहकारी बैंक सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार द्वारा निर्धारित नियमों के अधीन हैं, सहकारी बैंकों में वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में कई तरह की बैंकिंग सेवाएँ देने की कम क्षमता होती है, भारत में वाणिज्यिक बैंकों का दायरा सहकारी बैंकों की अपेक्षा अधिक विस्तृत है, सहकारी बैंकों की ब्याज दर वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में अधिक रहती है।
राजस्थान सहकारी बैंक
सहकारी बैंकों का इतिहास :- भारत में सहकारी आंदोलन की शुरुआत किसानों, कारीगरों और समाज के अन्य वर्ग के लोगों के विकास में मदद करने हेतु बचत को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से की गई थी, भारतीय सहकारी बैंकिंग का इतिहास वर्ष 1904 में सहकारी समिति अधिनियम के पारित होने के साथ शुरू हुआ। इस अधिनियम का उद्देश्य सहकारी ऋण समितियों की स्थापना करना था, स्वतंत्रता के बाद पहले 3 वर्षों के दौरान यानी वर्ष 1949 तक सहकारी बैंकिंग की दृष्टि से कुछ भी महत्त्वपूर्ण कार्य संभव नहीं हो पाया, हालाँकि तब तक तात्कालिक भारतीय नेता देश की जड़ों को मज़बूत करने के लिये सहकारी बैंकों की भूमिका को पहचान चुके थे एवं इसी कारण शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं में देश के सहकारी ढाँचे को मज़बूत करने हेतु अलग-अलग प्रावधान किये गए, उल्लेखनीय है कि शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं में सहकारी बैंकिंग से संबंधित प्रावधान होने के बावजूद इसका अत्यधिक विकास संभव नहीं हो पाया, जिसके चलते इस ओर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता महसूस की गई, छठी और सातवीं पंचवर्षीय योजना ने देश के सहकारी ढाँचे के विस्तार और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सहकारी बैंकों का उद्देश्य :- ग्रामीण वित्तपोषण और सूक्ष्म वित्तपोषण हेतु, आम नागरिकों को बिचौलियों और साहूकारों के शोषण से मुक्त करना, देश के किसानों और गरीबों की सामाजिक आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये उन्हें सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध कराना, ग्रामीण क्षेत्रों में ज़रूरतमंद लोगों और किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करना, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लघु उद्योग और स्व-रोज़गार गतिविधियों में संलग्न लोगों को व्यक्तिगत वित्तीय सेवाएँ प्रदान करना।

सहकारी बैंकों का महत्त्व :- सहकारी बैंकों ने गाँवों और कस्बों में आम लोगों को बैंकिंग से जोड़कर देश की प्रगति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है, देश के सहकारी ऋण ढाँचे का मुख्य उद्देश्य आम जनता को पारंपरिक ऋण स्रोतों का एक बेहतर विकल्प प्रदान करना है और, सहकारी बैंकों ने इस उद्देश्य की प्राप्ति में बेहतर प्रदर्शन किया है। सहकारी बैंक ग्रामीण ऋण और कम पढ़ी-लिखी आबादी को परंपरागत उधारदाताओं के चंगुल से बचाते हैं, ध्यातव्य है कि देश में परंपरागत उधारदाताओं ने दशकों से अपना वर्चस्व कायम किया हुआ है और ऋण पर ब्याज की ऊँची दर लगाकर वे आज भी गरीब लोगों का शोषण कर रहे हैं, सहकारी बैंक अपने ग्राहकों को अपेक्षाकृत काफी सस्ती ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराते हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य लाभ कमाना न होकर अपने सदस्यों को अच्छी सेवाएँ देना होता है, सहकारी बैंकों ने कृषकों के बीच बचत की आदतें विकसित कर बचत और निवेश को भी प्रोत्साहित किया है।

सहकारी बैंक और अर्थव्यवस्था :- देश के नागरिकों की आर्थिक वृद्धि में ही देश की वृद्धि छिपी होती है और दुनिया भर में जितने भी सहकारी ढाँचे कार्य कर रहे हैं उनके प्रमुख सिद्धांतों में सदस्यों का आर्थिक विकास पहले स्थान पर है। भारत में भी सहकारी बैंक कई लोगों के लिये लाइफलाइन (Lifeline) के रूप में कार्य कर रहे हैं, आज देश भर में सहकारी बैंक, वाणिज्यिक बैंकों के साथ काम कर रहे हैं और कृषि एवं कृषि-आधारित कार्यों में लगे लोगों के लिये आवश्यकता-आधारित वित्त प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, हालाँकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि देश के सहकारी बैंकों को बदलते समय के साथ आवश्यकतानुसार बड़े बदलावों की आवश्यकता है।

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सहकारी बैंकों के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ :- कुछ समितियों की रिपोर्ट दर्शाती है कि सहकारी बैंकिंग अपने लंबे इतिहास के बावजूद देश में किसानों का विश्वास जीतने में असफल रही है और यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में अधिकतर किसानों द्वारा लिये जाने वाले ऋण का कुछ ही हिस्सा सहकारी बैंकों से लिया जाता है, अब तक छोटे किसानों की ज़रूरतों को पूरा करने में असफल रहा है, सभी स्तरों पर अतिदेय (Overdues) एक बड़ी समस्या है, आँकड़े दर्शाते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारिता की सदस्यता मात्र 45 प्रतिशत ही है, जिसका अर्थ यह हुआ कि ग्रामीण क्षेत्र के 55 प्रतिशत लोग अब तक सहकारिता से जुड़ ही नहीं पाए हैं। वर्ष 1972 में गठित बैंकिंग आयोग ने इसके लिये निम्नलिखित कारणों को ज़िम्मेदार बताया था, ऋण हेतु निश्चित सुरक्षा (Security) प्रदान करने में लोगों की अक्षमता, भूमि रिकॉर्ड का कुप्रबंधन, निर्धारित क्रेडिट सीमा की अपर्याप्तता, ऋण चुकाने में सदस्य की अयोग्यता, कई अध्ययनों में सामने आया है कि देश के कुछ सहकारी बैंक निष्क्रिय हो गए हैं और कुछ तो सिर्फ कागज़ों पर ही हैं, अधिकतर सहकारी बैंक पेशेवर प्रबंधन की कमी का भी सामना कर रहे हैं।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण समस्या सहकारी बैंकों पर नियंत्रण के द्वंद्व से उत्पन्न होती है, क्योंकि इनका नियमन और नियंत्रण तो RBI द्वारा किया जाता है परंतु इसका प्रशासन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है।

सहकारी बैंकिंग प्रणाली :- सहकारी बैंकिंग प्रणाली में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की कमी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय है, जिससे जल्द-से-जल्द निपटना आवश्यक है, सहकारी बैंकिंग प्रणाली में वॉचडॉग यानी ऑडिटर को और अधिक जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ ऑडिटर और जाँच संस्थानों की मौजूदगी के बावजूद भी लोगों ने घोटाले किये, जैसे ही कोई बड़ा बैंकिंग घोटाला सामने आता है, उस बैंक के जमाकर्त्ताओं के समक्ष समस्या उत्पन्न हो जाती है और उन्हें अपने ही पैसे को निकालने के लिये लंबे समय तक इंतज़ार करना पड़ता है। वर्ष 2001 में हुआ माधवपुरा मर्सेन्टाइल कोऑपरेटिव बैंक घोटाले में बैंक के लगभग 45000 जमाकर्त्ताओं को अपने पैसे निकालने के लिये 1 साल से भी अधिक समय तक इंतज़ार करना पड़ा था। अतः आवश्यक है कि इस समस्या को जल्द-से-जल्द संबोधित किया जाए ताकि बैंक ग्राहकों को परेशानी का सामना न करना पड़े, विशेषज्ञों का मानना ​​है कि पूर्व डिप्टी गवर्नर आर. गांधी की अध्यक्षता में गठित शहरी सहकारी बैंकों पर उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सुझावों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये। समिति की

रिपोर्ट में की गई मुख्य सिफारिशें हैं :- सहकारी बैंकों पर RBI को अधिक शक्तियाँ प्राप्त होनी चाहिये, बैंकों को बंद करने और उन्हें तरलता प्रदान करने जैसे निर्णय लेने हेतु RBI को सशक्त बनाने की आवश्यकता है, यदि शहरी सहकारी बैंक स्वेच्छा से छोटे वित्त बैंकों में बदलना चाहते हैं और साथ ही वे केंद्रीय बैंक के सभी मानदंडों को भी पूरा करते हैं तो उन्हें इसकी अनुमति दी जानी चाहिये।

भूमिका :- राज्य के कृषकों को उनके कृषि विकास के साथ ग्रामीण विकास की आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए प्राथमिक बैंकों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के ऋण एवं क्रेडिट निर्धारित ऋण नीति के अन्तर्गत मुहैया कराना । राज्य में भूमि विकास बैंकों का संघीय संगठन है, राज्य स्तर पर राज्य भूमि विकास बैंक है जिसकी स्थापना 26 मार्च 1957 को हुई थी। जिला स्तर पर प्राथमिक भूमि विकास बैंक कार्यरत है। राज्य के 33 जिलो में 36 भूमि विकास बैंक अपनी 133 शाखाओ के माध्यम से दीर्घकालीन ऋण वितरित किये जा रहे है, राज्य के कृषकों को उनके कृषि विकास के साथ ग्रामीण विकास की आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए प्राथमिक बैंकों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के ऋण एवं क्रेडिट निर्धारित ऋण नीति के अन्तर्गत मुहैया कराना ।

परिचय :- स्वतंत्रता से पूर्व राज्य में प्रथम भूमि बन्धक बैंक की स्थापना 1924 में अजमेर में हुई थी। उसके पश्चात् 1928 में ब्यावर में भूमि बन्धक बैंक की स्थापना हुई। स्वतंत्रता के पश्चात् 1954 में ग्रामीण साख सर्वे कमेटी द्वारा सिफारिश की गई कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में प्रतिपादित योजनाबध्द विकास की अवधारणा के अंतर्गत भूमि बन्धक बैंकों को क्रषि क्षेत्र में उत्पादक उद्देश्यो हेतु ऋण उप्लब्ध कराने चहिए। ग्रामीण साख सर्वे कमेटी की सिफारिशो के क्रम में राजस्थान भूमि बन्धक अधिनियम 1956 के अंतर्गत राज्य भूमि बन्धक बैंकों कि स्थापना हुई। 1956 में राजस्थान सहकारी संस्था अधिनिय के अंतर्गत बन्धक शब्द के स्थान पर विकास शब्द का उपयोग प्रारम्भ किया गया। इस प्रकार भूमि बन्ध बैंकों का नाम बदलकर राज्य भूमि विकास बैंक एवम प्राथमिक भूमि विकास बैंक किया गया।

बैंक कृषि ऋण योजनाएं :- बैंक ऋण योजनाएं इस प्रकार से हैं-
1) लघु सिचाई योजनाएं
2) कृषियंत्रीकरण ऋण योजना
3) विविधिक्रत ऋण योजना
4) जन मंगल आवास् योजना
5) अन्य योजनाएं

निष्कर्ष – देश में सहकारी बैंकों की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि इन्हीं के माध्यम से हम देश में बैंकिंग प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा पाए हैं, परंतु सहकारी बैंकों संबंधी घोटालों को देखते हुए यह भी आवश्यक है कि देश का सहकारी बैंकिंग ढाँचा स्वयं में कुछ बुनियादी परिवर्तन करे। नियंत्रण के द्वंद्व की समस्या सहकारी बैंकों के समक्ष मौजूद सबसे बड़ी समस्या है, जिससे निपटने के लिये आवश्यक है कि RBI और राज्य सरकार एक ही पटल पर आकर समन्वित रूप से कार्य करें ताकि सहकारी बैंकों को देश के विकास में योगदान हेतु तैयार किया जा सके।

राजस्थान सहकारी बैंक संबंधित महत्वपूर्ण Question Answer :- 

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