राजस्थान के राज्यपाल से संबंधित
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राजस्थान के राज्यपाल से संबंधित
भारत में राज्यपाल :- जिस प्रकार केंद्र में राष्ट्र का प्रमुख राष्ट्रपति होता है उसी प्रकार राज्यों में राज्य का प्रमुख राज्यपाल होता है, उल्लेखनीय है कि राज्यपाल राज्य का औपचारिक प्रमुख होता है और राज्य की सभी कार्यवाहियाँ उसी के नाम पर की जाती हैं, प्रत्येक राज्य का राज्यपाल देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है एवं यह राज्य के मुख्यमंत्री की सलाह से कार्य करता है, सामान्यतः राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, परंतु वह

संवैधानिक संबंधित प्रावधान :- भारतीय संविधान का भाग VI देश के संघीय ढाँचे के महत्त्वपूर्ण हिस्से यानी राज्यों से संबंधित है। संविधान के अनुच्छेद 152 से 237 तक राज्यों से संबंधित विभिन्न प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, अनुच्छेद 153 के मुताबिक, देश में प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होगा। साथ ही एक व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, अनुच्छेद 155 के अनुसार, राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, संविधान के अनुसार, राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख और प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। वह भारतीय राजनीति की संघीय प्रणाली का हिस्सा है तथा संघ एवं राज्य सरकारों के बीच एक पुल का काम करता है, संविधान के अनुच्छेद 157 और अनुच्छेद 158 में राज्यपाल के पद हेतु आवश्यक पात्रता निर्धारित की गईं है जो निम्नलिखित हैं वह भारतीय नागरिक हो, उसकी उम्र कम-से-कम 35 वर्ष हो, वह न तो संसद के किसी सदन का सदस्य हो और न ही राज्य विधायिका का, वह किसी लाभ के पद पर न हो, ध्यातव्य है कि संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को विवेकाधिकार की शक्ति प्रदान करता है अर्थात् वह स्वविवेक संबंधी कार्यों में मंत्रिपरिषद की सलाह मानने हेतु बाध्य नहीं है। राज्यपाल को निम्नलिखित विवेकाधीन शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री के चयन में अपने विवेक का उपयोग कर सकता है, किसी दल को बहुमत सिद्ध करने हेतु कितना समय दिया जाना चाहिये यह भी राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करता है, आपातकाल के दौरान वह मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिये बाध्य नहीं होता। ऐसे समय में वह राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है और राज्य का वास्तविक शासक बन

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राज्यपाल की नियुक्ति :- गौरतलब है कि राज्यपाल का चुनाव न तो सीधे आम लोगों द्वारा किया जाता है और न ही कोई विशेष रूप से गठित निर्वाचक मंडल इसका चुनाव करता हैइसके विपरीत राज्यों के गवर्नर की नियुक्ति प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति द्वारा की जाती है जिसके कारण उसे केंद्र सरकार का प्रतिनिधि भी कहा जाता है, संविधान निर्माण के समय मसौदा समिति ने यह निर्णय संविधान सभा पर छोड़ दिया था कि देश में राज्यपालों के लिये चुनाव किये जाने चाहिये या फिर उनका मानांकन किया जाना चाहिये, इस विषय पर संविधान सभा का मानना था कि राज्यपालों के चयन के लिये चुनाव किया जाना चाहिये, परंतु राज्यपाल और मुख्यमंत्री की शक्तियों के बीच टकराव की आशंका ने राज्य में राज्यपाल

राज्यपाल की भूमिका :- प्रत्येक राज्य का राज्यपाल वहाँ लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ध्यातव्य है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 तक राज्यपाल की भूमिका का वर्णन किया गया है, राज्य के राज्यपाल की भूमिका कमोबेश देश के राष्ट्रपति के सामान ही होती है। राज्यपाल सामान्यतः राज्यों के लिये राष्ट्रपति जैसी भूमिका का निर्वाह करता है, राज्यपाल के कार्यों को मुख्यतः 4 भागों (1) कार्यकारी (2) विधायी (3)

कार्यकारी :- राज्य का संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राज्यपाल को कई महत्त्वपूर्ण कार्य करने होते हैं, इसमें बहुमत प्राप्त दल के नेता को राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करना तथा राज्य मंत्रिमंडल के गठन में मुख्यमंत्री की सहायता करना आदि शामिल हैं। साथ ही राज्य के महाधिवक्ता तथा राज्य लोक आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का कार्य भी राज्यपाल द्वारा ही किया जाता है।

विधायी :- राज्यपाल के पास राज्य की विधानसभा की बैठक को किसी भी आपात स्थिति में बुलाने और किसी भी समय स्थगित करने का अधिकार होता है। साथ ही उसे दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने का भी अधिकार है। उसे राज्य विधानसभा में पारित किये जाने वाले किसी भी विधेयक को रद्द करने, समीक्षा के लिये वापस भेजने और राष्ट्रपति के पास भेजने का अधिकार है। इसका अर्थ है कि राज्य विधानसभा में कोई भी विधेयक राज्यपाल की अनुमति के बिना पारित नहीं किया जा सकता। राज्य में आपातकाल के दौरान किसी भी प्रकार का अध्यादेश जारी करने का कार्य भी राज्यपाल का होता है।

वित्तीय :- राज्यपाल का कार्य यह सुनिश्चित करना भी होता है कि वार्षिक वित्तीय विवरण (राज्य-बजट) को राज्य विधानमंडल के सामने रखा जाए। साथ ही किसी भी धन विधेयक को विधानसभा में उसकी अनुमति के बाद ही प्रस्तुत किया जा सकता है। पंचायतों एवं नगरपालिका की वित्तीय स्थिति की हर पाँच वर्षों बाद समीक्षा करने के लिये राज्यपाल राज्य वित्त आयोग का भी गठन करता है।

न्यायिक :- राज्यपाल के न्यायिक कार्यों में राज्य के उच्च न्यायालय के साथ विचार कर ज़िला न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नति संबंधी निर्णय लेना शामिल है। वह राज्य न्यायिक आयोग से जुड़े लोगों की नियुक्ति भी करता है, महत्त्वपूर्ण निर्णय जिन्होंने राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को आकार दिया |

एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार :- सर्वोच्च न्यायालय के कई ऐसे फैसले हैं, जिनका समाज और राजनीति पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है इन्हीं में से एक है 11 मार्च, 1994 को दिया गया ऐतिहासिक फैसला जो राज्यों में सरकारें भंग करने की केंद्र सरकार की शक्ति को कम करता है, गौरतलब है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई के फोन टैपिंग मामले में फँसने के बाद तत्कालीन राज्यपाल ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया था, जिसके बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँचा था, सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 356 के व्यापक दुरुपयोग पर विराम लगा दिया, इस फैसले में न्यायालय ने कहा था कि “किसी भी राज्य सरकार के बहुमत का फैसला राजभवन की जगह विधानमंडल में होना चाहिये। राष्ट्रपति शासन लगाने से पहले राज्य सरकार को शक्ति परीक्षण का मौका देना होगा।”

रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत सरकार :- वर्ष 2006 में दिये गए इस निर्णय में पाँच सदस्यों वाली न्यायपीठ ने स्पष्ट किया था कि यदि विधानसभा चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता और कुछ दल मिलकर सरकार बनाने का दावा करते हैं तो इसमें कोई समस्या नहीं है, चाहे चुनाव पूर्व उन दलों में गठबंधन हो या न हो।

नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष :- वर्ष 2016 में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया था कि राज्यपाल के विवेक के प्रयोग से संबंधित अनुच्छेद 163 सीमित है और उसके द्वारा की जाने वाली कार्रवाई मनमानी या काल्पनिक नहीं होनी चाहिये। अपनी कार्रवाई के लिये राज्यपाल के पास तर्क होना चाहिये और यह सद्भावना के साथ की जानी चाहिये।
विभिन्न आयोगों और समितियों द्वारा दी गई सिफारिशें वर्ष 1966 में केंद्र सरकार द्वारा मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) का गठन किया गया था, आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि राज्यपाल के पद पर किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहिये जो किसी दल विशेष से न जुड़ा हो, वर्ष 1970 में तमिलनाडु सरकार द्वारा केंद्र व राज्य संबंधों पर विचार करने के लिये राजमन्नार समिति का गठन किया गया था। गौरतलब है कि इस समिति ने भारतीय संविधान से अनुच्छेद 356 और 357 के विलोपन (Deletion) की सिफारिश की थी। संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि राज्य सरकार संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्य करने में असमर्थ है तो केंद्र राज्य पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण स्थापित कर सकता है। संविधान के अनुसार, इसकी घोषणा राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति से सहमति प्राप्त करने के बाद की जाती है। साथ ही समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया में राज्यों को भी शामिल किया जाना चाहिये, 1980 में गठित सरकारिया आयोग ने 1988 में 1600 पेज की अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, जिसमें केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर बिंदुवार 247 सिफारिशें की गई थीं। सरकारिया आयोग की केंद्र-राज्य संबंधों के बारे में जो अनुशंसाएं हैं, उसके भाग-1 और अध्याय-4 में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल का पद एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है, राज्यपाल न तो केंद्र सरकार के अधीनस्थ है और न उसका कार्यालय केंद्र सरकार का कार्यालय है।

राज्यपाल के पद का महत्त्व :- कई विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल का पद केंद्र और राज्यों के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में है जो देश के संघीय ढाँचे को सुव्यवस्थित रूप से चलाने में मदद करता है, गौरतलब है कि लोकतंत्र के सुचारु संचालन में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, चूँकि हमारा देश राज्यों में विभाजित है इसलिये कई जानकार देश के राष्ट्रीय हित, अखंडता और आंतरिक सुरक्षा के लिये केंद्रीय पर्यवेक्षण की वकालत करते हैं जिसके लिये राज्यपाल की आवश्यकता होती है।

राज्यपाल पद संबंधी विवाद :- देश में राज्यपाल के पद के दुरुपयोग के कई उदाहरण देखने को मिले हैं, आमतौर पर माना जाता है कि चूँकि राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है इसलिये वह राज्य में केंद्र के निर्देशों पर कार्य करता है और यदि केंद्र व राज्य में एक ही दल की सरकार नहीं है तो राज्य की कार्यप्रणाली में काफी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं कई मामलों में एक विशेष राजनीतिक विचारधारा के साथ जाने-माने राजनेताओं और पूर्व नौकरशाहों को ही सरकार द्वारा राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया है। गौरतलब है कि इसके परिणामस्वरूप कई बार राज्यपालों को पक्षपात करते हुए भी देखा गया हैइसी वर्ष राजस्थान के राज्यपाल पर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। सत्ताधारी दल को समर्थन प्रदान करना किसी भी संवैधानिक पद पर काबिज़ व्यक्ति से अपेक्षित नहीं होता है, परंतु फिर भी समय-समय पर ऐसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं।
राज्य में चुनावों के बाद सरकार बनाने के लिये सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को आमंत्रित करने हेतु राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों का अक्सर किसी विशेष राजनीतिक दल के पक्ष में दुरुपयोग किया गया है, कार्यकाल की समाप्ति से पहले ही राज्यपाल को पद से हटाना भी हाल के दिनों में एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है, राज्यपाल को इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि वह केंद्र की सत्ता में मौजूद दल की नीतियों और विचारधाराओं के साथ तालमेल नहीं रखता।

आगे की राह :- इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्यपालों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल से संबंधित प्रावधानों में बड़े सुधारों की आवश्यकता है, वर्ष 1970 में गठित राजमन्नार समिति की सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिये और राज्यपालों की नियुक्ति प्रक्रिया में राज्यों को भी शामिल किया जाना चाहिये। उल्लेखनीय है कि केंद्र-राज्य समीकरणों में असंतुलन को दूर रखने की शुरुआत इस तरह के सुधार से की जा सकती है, राज्यपालों द्वारा लिये गए निर्णयों को न्यायिक जाँच के अधीन लाया जाना चाहिये जिसमें उस निर्णय तक पहुँचने के लिये प्रयोग किये गए स्रोत भी शामिल हों, राज्यपाल के कार्यालय से जुड़ी शक्तियाँ और विशेषाधिकार जवाबदेही तथा पारदर्शिता के साथ संलग्न होने चाहिये, राज्यपाल को अपने दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करने में सक्षम बनाने के लिये राज्य सरकारों, केंद्र सरकार, संसद और राज्य विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित एक ‘सहमत आचार संहिता’ विकसित की जानी चाहिये।
राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों पर अंकुश लगाया जाना चाहिये और मुख्यमंत्री की नियुक्ति को लेकर उचित दिशा-निर्देश होने चाहिये।

विधान मंडल :- राज्य की समस्त विधायी शक्ति विधान मंडल में होती है। भारत के प्रत्येक राज्य में विधान मंडल का निर्माण राज्यपाल एवं राज्य के एक या दो सदनों से होता है। राय के ये सदन विधानसभा एवं विधान परिषद् कहलाते है। राजस्थान में विधान मंडल राज्यपाल एवं एक सदन (विधानसभा) से मिलकर बना हुआ है।

राज्यपाल का संवैधानिक स्वरुप :-
1) राज्यपाल उस राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है।
2) राज्यपाल में राज्य की सभी कार्यपालिका एवं विधायी शक्तियां निहित होती है।
3) राज्यपाल राज्य का प्रथम व्यक्ति होता है।
4) संविधान के अनुछेद 153 में प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल की व्यवस्था की गयी है।
5) राज्यपाल की नियुक्ति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
6) राज्यपाल को उस राज्य का मुख्यन्यायाधीश या उसकी अनुपस्थिति में वरिष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाता है।

राज्यपाल की योग्यताएं :-
1) राजपाल की न्यूनतम आयु 35 अनिवार्य है।
2) व्यक्ति किसी भी सरकारी पद या राजनैतिक पद पर नहीं होना चाहिए।
3) वह भारत का नागरिक होना चाहिए। उस राज्य का होना अनिवार्य नहीं है।

राज्यपाल की कार्यपालिकायी शक्तियां :-
1) वह राज्य की कार्यपालिका का प्रधान होता है।
2) विधान सभा में राज्यपाल बहुमत वाले दल के नेता को मुख्यमंत्री चुनता है।
3) बहुमत न होने पे वह स्वविवेक से उस दाल के नेता को मुख्यमंत्री चुनता है जो विधानसभा में बहुमत हासिल कर लेगा।
4) राज्यपाल मुख्यमंत्री एवं मंत्री परिषद् को गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
5) राज्यपाल राज्य के समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति करता है, एवं स्वयं समस्त विश्वविद्यालयों का पड़ें कुलपति होता है।
6) राज्यपाल राज्य के लिए राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करता है।
7) राज्यपाल एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए विधानसभा में एक सदस्य को मनोनीत कर सकता है।
8) राज्यपाल लोकायुक्त की नियुक्ति करता है।
9) राज्य की संवैधानिक असफलता की स्थिति में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देता है, उस प्रतीवेदन के आधार पर अनुच्छेद 356 के अनुसार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

राज्यपाल की विधायी शक्तियां :- राज्यपाल को किसी भी समय विधानसभा का अधिवेशन बुलाने और उसे भांग करने का अधिकार प्राप्त है, कोई भी विधेयक कानून नहीं बन सकता जब तक राज्यपाल उस ओर अपनी स्वीकृति नहीं दे देता, राज्यपाल द्वारा जारी अधयादेश६ माह तक कानून की भाटी प्रभावी होता है, वित्तीय विदेयक राज्यपाल की अनुमति के बाद ही विधान मंडल में प्रस्तुत किये जाते है, पंचायतों व नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थितियों की समीक्षा के लिए राज्यपाल हर 5 वर्ष में वित्त आयोग का गठन करता है, राज्यपाल मृत्युदंड को स्थगित नहीं कर सकता। यह अधिकार सितफ राष्ट्रपति के पास है। शेष दण्ड को वह निलंबित या स्थगित कर सकता है।

विधानसभा :- किसी भी राज्य की विधान सभा में न्यूनतम 60 एवं अधिकतम 400 सदस्य हो सकते है। राजस्थान की विधान सभा में कुल 200 सदस्य हैं, विधानसभा सदस्य उनके क्षेत्र से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा निर्वाचित होते है, विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, विधानसभा में एक वर्ष में कम से कम २ बैठक होना अनिवार्य है। और इनके मध्य 6 माह से अधिक अंतर नहीं हो सकता, विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव सदस्य अपने में से किसी सदस्य के बमत के आधार पर करते हैं। बिलकुल इसी तरह उपाध्यक्ष का ही चुनाव किया जाता है विधानसभा द्वारा राज्यसूचि एवं समवर्ती सूचि में कानून बनाये जाते हैं, राष्ट्रपति एवं राज्यसभा सदस्यों के चुनाव में विधानसभा सदस्य भाग लेते है। इसलिए ये चुनाव अप्रत्यक्ष चुनाव है।

राजस्थान उच्च न्यायालय :- संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार हर राज्य में एक उच्च न्यायालय की स्थापना की गयी है, राज्य के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्यन्यायाधीश एवं राज्य के राज्यपाल के परामर्श से होती है, उच्च न्यायालय के अतिरिक्त सभी अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल करता है, उच्च न्यायालय का प्रत्येक न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बना रह सकता है, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंपते हैं, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को केवल अक्षमता एवं अनाचार के आरोप में संसद के महाभियोग राष्ट्रपति के आदेश से पदमुक्त किया जा सकता है, राजस्थान में राजस्थान उच्च न्यायालय की स्थापना 1949 में जोधपुर में की गयी। तथा उसकी एक खंड पीठ जयपुर में स्थापित की गयी। वर्तमान में राजस्थान उच्च न्यायालय में 50 न्यायाधीश नियुक्त किये गए है, राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रथम न्यायाधीश श्री कमलकांत वर्मा थे, राजस्थान में जिला स्टार पर दीवानी मामलों के लिए जिला न्यायलय एवं फौजदारी मामलों के लिए सेशन कोर्ट है।

निष्कर्ष :- महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलने और सरकार बनाने के समर्थन तथा आरोपों के बीच राज्यपाल पद का मुद्दा एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गया है। यह कहा जा सकता है कि राज्यपाल का पद व्यर्थ है और राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ है, परंतु हमें राज्यपाल द्वारा निभाई जाने वाली महत्त्वपूर्ण भूमिका को अनदेखा नहीं करना चाहिये। वह केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के बीच एक सेतु का कार्य करता है। वह राज्य सरकार के गठन में मदद करता है और राज्य विधानसभा में पारित होने वाले विधेयकों की वैधानिकता पर भी नज़र रखता है। अतः लोकतंत्र के स्वस्थ कामकाज में राज्यपाल की आवश्यकता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिये। हालाँकि यह तथ्य भी सही है कि राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण विगत कुछ समय में इस पद को लेकर प्रश्न उठे हैं। राज्यपाल के पद संबंधी इन विवादों और चुनौतियों पर ध्यान दिया जाना चाहिये तथा सभी हितधारकों से बात कर इसमें सुधार का प्रयास किया जाना चाहिये।

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