राजस्थान के प्रमुख पशुधन

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भारत पशु पालन और पशु उत्पादक में भारत के राजस्थान राज्य का अपना अलग ही योगदान है भारत की जीडीपी में राजस्थान द्वारा 10.30% का योगदान पशुओ के है. पशुओं की पहली पशुगणना 1919 में हुई थी और उसके बाद हर 5 साल बाद राजस्व मंडल अजमेर द्वारा यह गणना की जाती है अब तक राजस्थान में 20 वी पशुगणना हो चुकी है जो जुलाई 2017 में की गयी थी पशुगणना से यह पता चलता है की किस क्षेत्र में कौन कौन से और कितने पशु है और साथ ही वो किस तरह से उपयोग में लिए जा रहे है सुचना अनुसार सबसे ज्यादा पशु राजस्थान के दौसा व राजसमंद में और सबसे कम पशु जैसलमेर में है आइए पशुओं के बारे में ऐसी ही कुछ और विशेष व रोचक जानकारियों के बारे में बात करते है |
राजस्थान के प्रमुख पशुधन
गाय की नस्ले :- राजस्थान के अंदर विभिन्न प्रजातियों की गाये पायी जाती है । राजस्थान के अंदर गौ वंश ज्यादा संख्या में पाए जाते है । राजस्थान को गौ वंश का ५ वा स्थान दिया जाता है तथा यहाँ विदेशी गाये की भी नस्ले पायी जाती है । राजस्थान में गायो की विभिन्न नस्लों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया गया है |
राजस्थान के प्रमुख पशुधन
गीर :- गीर गाय को अजमेरी नाम से भी पुकारा जाता है ये अधिक दूध देने के कारन भी प्रसिद्ध है । ये राजस्थान के अजमेर, किशनगढ़ तथा बूंदी में पायी जाती है ।
राजस्थान के प्रमुख पशुधन
हरियाणवी :- हरियाणवी गाय का वैसे तो मुख्य स्थान हरियाणा है लेकिन यह राजस्थान के सीकर , गंगानगर, हनुमानगढ़ में देखने को मिलती है । ये दूध के साथ साथ अन्य कार्य करने के लिए भी मशहूर मणि जाती है ।
राजस्थान के प्रमुख पशुधन
नागौरी :- यह बीकानेर नागौर में पायी जाती है तथा इसका मुख्य स्थान नागौर जिले का सुहालक प्रदेश है । इसका मुख्य कार्य बेल जोड़ने का है।
राजस्थान के प्रमुख पशुधन
राठी :- राजस्थान में पशु सम्पदाएँ

राजस्थान में पशु सम्पदाएँ :- राठी नाम की गाये राजस्थान में कामधेनु के नाम से भी प्रसिद्ध है । ये गाये अधिक दूध देती है । यह राजस्थान के बीकानेर चूरू श्रीगंगानगर जिले में अधिक पायी जाती है ।

मालवी :- उदयपुर बासवारा में ये अधिक संख्या में पायी जाती है इनका महत्वपूर्ण कार्य हल जोतना है तथा ये वजन में भरी होती है । इसका मुख्य स्थान मध्यप्रदेश के मालवा में है।

राजस्थान में पशु सम्पदाएँ :- यह दूध देने वाली गाय की नस्ल हो राजस्थान में पाली जाती है।

गाय की विदेशी नस्ल :- राजस्थान के अंदर विदेशी नस्ल की भी गाये पायी जाती है जिनमे से कुछ गाये अधिक दूध देती है वो इस प्रकार से है

जर्सी गाय :- जर्सी गाय वैसे तो अमरीका की नस्ल है लेकिन भारत में राजस्थान के अंदर ज्यादा संख्या में पायी जाती है । यह गाय अधिक दूध देने वाली मानी जाती है ।

होलिस्टिन :- होलिस्टिन गाय वैसे तो अमेरिका व हॉलैंड में पायी जाती है लेकिन राजस्थान के कुछ जिलों के अंदर यह देखने को मिलती है इन गायो की मुख्य विशेषता यह होती है की यह ज्यादा मात्रा में दूध देती है

भैंस की नस्ले :- भारत में उत्तरप्रदेश के बाद राजस्थान राज्य को दूसरा स्थान दिया जाता है जंहा सर्वाधिक मात्रा में भेंसे देखने को मिलती है राजस्थान के उदयपुर के अंदर भैंस प्रजनन केंद्र भी खुला हुआ है राजस्थान के अंदर भेंसो की विभिन्न नस्ले पाई जाती है जिनमे से कुछ के नाम इस प्रकार से है जैसे मुर्रा, जाफराबादी , मेहसाणी, भदावरी आदि

मुर्रा :- मुर्रा भैंस भेंसो के अंदर सर्वोत्तम उच्चम किस्म की नस्ल होती है जो अधिक मात्रा में दूध देती है जो राजस्थान के जयपुर अलवर ज्यादा संख्या में पायी जाती है

जाफराबादी :- यह भेंसो के अंदर सबसे अधिक शक्तिशाली होती है जो राजस्थान के कोटा बारां व झालावाड़ के अंदर पायी जाती है

मेहसाणी :- यह भैंस मेहसाणा के अंदर पायी जाती है

भदावरी :- यह भेंसो के अंदर सबसे अधिक मात्रा में घी देने वाली नस्ल है वैसे तो इसका मूल स्थान उत्तरप्रदेश में है लेकिन राजस्थान के कुछ इलाको थोड़ी मात्रा में पायी जाती है इस भैंस की खास बात ये है की इसके दूध के अंदर औसतन 8% वसा पायी जाती है

भेड़ की नस्ले :- राजस्थान को भेड़ो की संख्या के आधार पर तीसरा स्थान स्थान दिया गया है राजस्थान के बाड़मेर के अंदर सबसे अधिक मात्रा में भेड़ पायी जाती है तथा बांसवाड़ा के अंदर सबसे कम संख्या में पायी जाती है राजस्थान में भेड़ो की विभिन्न नस्ले पायी जाती है जो निम्न प्रकार से है

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चोकला भेड़ :- चोकला नामक भेड़ की उन सबसे अधिक श्रेष्ठ मानी जाती है इसे भारत की मेरिनो के नाम से भी जाना जाता है यह राजस्थान के सीकर चूरू बीकानेर व जयपुर पाई जाती है

नाली :- यह सर्वाधिक उन देने वाली होती है इसके उन के रेशे काफी लम्बे होते है यह राजस्थान के गंगानगर , झुंझनू में पाई जाती है

खेरी नस्ल :- भेड़ो के रेवडो के अंदर सबसे अधिक देखने को मिलती है

मगर भेड़ :- भेड़ो की प्रजाति के अंदर सबसे अधिक मांस देने वाली भेड़ को मगर भेड़ कहा जाता है जिसे बीकानेरी चोकला के नाम से भी जाना जाता है यह राजस्थान के बीकानेर और नागौर के अंदर सबसे अधिक पाई जाती है |

मालपुरी भेड़ :- इस नस्ल की भेड़े अधिकतर सवाई माधोपुर ,टोंक, जयपुर, बूंदी ,भीलवाड़ा, अजमेर जिले में पाई जाती है ।इसको देसी नस्ल भी खा जाता है और इसकी उन मोटी होने के कारण गलीचे बनाने के काम आती है।

सोनाड़ी भेड़ :- सोनाड़ी भेद को चनोथर भी कहा जाता है और यह चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा व इसके आस पास के इलाकों में पाई जाती है ।

पूगल भेड़ :- पूगल भेड़ जैसलमेर और नागौर जिले के साथ साथ बीकानेर के पश्चिमी भाग में भी देखने को मिलती है

भेड़ की विदेशी नस्ले :- भेड़ों की कुछ विदेशी नस्ले भी है जिनके नाम इस प्रकार से है :- रुसी मैरिनो भेड़, रेडबुल भेड़ तथा कोरिडेल भेड़

बकरी की नस्ले :- राजस्थान के अंदर बकरियों की नस्ले सबसे अधिक पाई जाती है 19 वीं पशु गणना के अनुसार राजस्थान में बकरियों की संख्या करीब 80 लाख थी राजस्थान जिले का वरुण गांव जो की बकरियों के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध है राजस्थान के अंदर बकरे का मांस भी सबसे अधिक होता है |

मारवाड़ी बकरी :- ये राजस्थान के बीकानेर बाड़मेर जोधपुर पाली आदि मरुस्थलीय क्षेत्र में पाई जाती है.

बारबरी बकरी :- यह सबसे अधिक दूध देने वाली ले नाम से प्रसिद्ध है ये राजस्थान के भरतपुर अलवर करोली में पाई जाती है |

जखराना या अलवरी :- जखराना भेड़ ज्यादा दूध देने के लिए जानी जाती है और ज्यादातर अलवर व इसके आस पास के क्षेत्र में पायी जाती है |

सिरोही :- इस नस्ल की बकरी मांस के लिए अधिक जानी जाती जाती है और अधिकतर पर्वतीय क्षेत्र में पायी जाती है |

जमुनापारी :- जमुनापारी बकरी अधिक मांस और दूध देने के लिए प्रसिद्ध है |

शेखावटी :- शेखावाटी बकरी शेखावाटी इलाके जैसे सीकर और झुंझुनू में पाई जाती है। यह बकरी बिना सिंग वाली होती है और प्रयाप्त मात्रा में दूध दे देती है |

ऊँट की नस्ले :- भारत में ऊँट की गणना सबसे ज्यादा राजस्थान में की गयी है. ऊँटो को रखने में राज्य का पहला स्थान है. बीकानेर में केंद्रीय ऊँट अनुसंधान संस्थान स्थापित किया गया है. वैसे सबसे ज्यादा ऊँट राजस्थान के बाड़मेर बीकानेर चूरू में देखने को मिलते है.

मुर्गी की नस्ले :- अगर मुर्गी की बात करें तो सबसे ज्यादा और अछि नस्ल की मुर्गियां अजमेर में पायी जाती है बांसवाड़ा में मुर्गी पालन के लिए कड़कनाथ योजना चलायी गयी है मुर्गी से सम्बन्धीत राजकीय कुक्कुट प्रशिक्षण केंद्र अजमेर में है और कुक्कुट फार्म जयपुर में है. मुर्गी की कई तरह की नस्लें भी होती है जैसे- टेनी, वाइट, बरसा, इटेलियन, असील और लेगहॉर्न

पशु गणना से सम्बंधित कुछ विशेष जानकारियां :- सर्वाधिक पशु सम्पदा में राजस्थान का दुसरा स्थान है. वैसे पहले स्थान पर भारत के उत्तरप्रदेश है, पशु सम्पदा राजस्व मंडल की स्थापना 1 नवम्बर 1949 में अजमेर में की गई थी और इसकी सहायक शाखा राज्य की राजधानी जयपुर में है, प्रति 5 वर्ष के बाद राजस्थान में पशु गणना राजस्व मंडल की देखरेख में की जाती है, राजस्व मंडल का प्रथम अध्यक्ष 1949 में बृजेन्द्र नाथ शर्मा को बनाया गया था.
हर 3 महीने बाद राजस्व मंडल द्वारा राविरा नामक पुस्तक जारी की जाती है जिसमे पशुओं सम्बन्धीत जानकारी का प्रकासाहन होता है, राजस्थान में पहली बार पशु गणना सन् 1919 से 1920 के बीच जयपुर, टोंक, बूंदी, जोधपुर, बीकानेर रियासतों में करवाई गई थी, भारत की आज़ादी के बाद पहली पशु गणना सन् 1951 में हुई थी, राजस्थान में 20 वी पशुगणना जुलाई 2017 से प्रारंभ हो चुकी है, 2012 में 19वीं पशु गणना की गई थी जिसके अनुसार राजस्थान में कुल77 करोड़ पशु है, 19वीं पशु गणना के अनुसार राजस्थान में सबसे ज्यादा पशु बकरी है.
की पशु गणना से पता चला की सबसे ज्यादा पशुओं वाला जिला बाड़मेर है, वंही सबसे कम पशु धौलपुर में है, राजस्थान में सबसे ज्यादा ऊँट बाड़मेंर में और सबसे काम प्रतापगढ़ में पाए जाते है, सबसे ज्यादा भेड़ भी बाड़मेर जिले में मिलती है, वंही सबसे कम बांसवाड़ा जिले में पायी जाती है, राजस्थान में सर्वाधिक बकरिया भी बाड़मेंर में मिलती हैं, वंही संबसे कम धौलपुर जिले में पायी जाती है |

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