राजस्थान के जनजातीय आंदोलन

Join Whats App Group 
Join Telegram Channel 

जनजाति आंदोलन क्या है, राजस्थान में किसान आंदोलन, जनजातीय आंदोलन, जनजातीय आंदोलन के कारण, राजस्थान की जनजाति, भील आंदोलन, बिजौलिया किसान आंदोलन, एक आयोग का गठन किया गया, बेंगु किसान आंदोलन, नीमूचणा किसान आंदोलन, बूंदी किसान आंदोलन, दूधवा-खारा किसान आंदोलन, मातृकुण्डिया किसान आंदोलन, मेव किसान आंदोलन, किषोरीदेवी, जयसिंहपुरा किसान हत्याकाण्ड, शेखावटी किसान आंदोलन , जनजाति आंदोलन, एकी आंदोलन/भोमट भील आंदोलन, मीणा आंदोलन, भगत आंदोलन

बिजौलिया किसान आंदोलन (1897 -1941) :- बिजौलिया ठिकाने का संस्थापक अषोक परमार था, खानवा के युद्ध में सांगा की सहायता करने के कारण, सांगा ने यह ठिकाना अषोक परमार को दिया था, बिजौलिया का क्षेत्र उपरमाल के नाम से जाना जाता हैं। इस ठिकाने में धाकड़ किसान कृषि कार्य करते थे, आंदोलन के प्रमुख कारण निम्न थें लागबांग (83 प्रकार की थी), बेगार, लाटा,कुंता व चंवरी कर, तलवार बंधाई कर(भू-राजस्व निर्धारण की पद्धतियां) बिजौलिया किसान आंदोलन की शुरूआत साधु सीतारामदास, नानकजी पटेल व ठाकरी पटेल के नेतृत्व में हुई थी। किसानों का यह आंदोलन साधु सीताराम के नेतृत्व में शुरू हुआ।जिसकी बागड़ोर 1916 विजयसिंह पथिक (बुलन्दषहर) ने सम्भली, 1917 ई. में विजयसिंह पथिक ने ऊपरमाल पंचबोर्ड़ की स्थापना की।1919 ई. में किसानों की मांगो के लिए
राजस्थान के जनजातीय आंदोलन
एक आयोग का गठन किया गया :- बिन्दुलाल भट्टाचार्य आयोग।1923-41 तक इस आंदोलन का राष्ट्रीय पहचान मिली।1927 में विजयसिंह पथिक इस आंदोलन से अलग हो गए। पथिक के बाद माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय तथा जमनालाल बजाज ने इस आंदोलन की बागड़ोर संभाली माणिक्यलाल वर्मां व मेवाड़ रियासत के प्रधानमंत्री टी.राघवाचार्य के बीच समझौता हुआ और, किसानों की अधिकांष मांग मान ली गयी, विजयसिंह पथिक को किसान आंदोलन का जनक, कहा जाता हैं।
राजस्थान के जनजातीय आंदोलन
बेंगु किसान आंदोलन (चित्तौड़गढ़) (1921) :- इसकी शुरूआत लाग बाग, बेगार प्रथा के विरोध के पिरणामस्वरूप कारण सन् 1921 ई. हुई थी, आंदोलन की शुरूआत रामनारायण चैधरी ने की बाद में इसकी बागड़ोर विजयसिंह पथिक ने सम्भाली थी। इस समय बेंगु के ठाकुर, अनुपसिंह थे। 1923 में अनुपसिंह और राजस्थान सेवा संघ के मंत्री रामनारयण, चैधरी के मध्य एक समझौता हुआ जिसे वोल्सेविक समझौते की संज्ञा दी गई। यह संज्ञा किसान आंदोलन के प्रस्तावों के लिए गठित ट्रेन्च आयोग ने दी थी, 13 जुलाई,1923 को गोविन्दपुरा गांव में किसानों का एक सम्मेलन हुआ, सेना के द्वारा किसानों पर गोलिया चलाई गयी। जिसमें रूपाजी और कृपाजी नामक दो किसान शहीद हुए। अन्त में बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया गया। यह आन्दोलन विजयसिंह पथिक के नेतृत्व में समाप्त हुआ था।, अलवर किसान आंदोलन:- अलवर में दो आंदोलन हुए थे सुअरपालन विरोधी आंदोलन (1921)
राजस्थान के जनजातीय आंदोलन
नीमूचणा किसान आंदोलन(1923-24) – सुअरपालन विरोधी आंदोलन (1921) :- अलवर में बाड़ों में सुअर पालन किया जाता था, जब कभी इन सुअर को खुला छोड़ा जाता था, तब ये फसल नष्ट कर देते थे। जिसका किसानों ने विरोध किया, जबकि सरकार ने सुअरों को मारने पर पाबंदी लगा रखी थी।, लेकिन अंत में सरकार के द्वारा सुअरों को मारने की अनुमति दे दी एवं आंदोलन शांत हो गया।, नीमूचणा किसान आंदोलन (1923-24):-अलवर के महाराजा जयसिंह द्वारा लगान की दर बढ़ाने पर 14 मई, 1925 को नीमूचणा गांव में 800 किसानों ने एक सभा आयोजित की जिस पर पुलिस ने गोलियां चलाई जिसमं सैकड़ों किसान मारे गए। गांधीजी ने इस आंदोलन को जलियांवालाबाग कांड से भी वीभत्स,की संज्ञा दी और इसे दोहरे डायरिजम की संज्ञा दी।

बूंदी किसान आंदोलन (1926) :- इस आंदोलन को बरड़ किसान आंदोलन भी कहते हैं, आंदोलन का मुख्य कारण अत्यधिक लगान, लाग बाग और बेगार थी। आंदोलन की शुरूआत नैनूराम शर्मा ने की। इनके नेतृत्व में डाबी नामक स्थान पर किसानों का एक सम्मेलन बुलाया, पुलिस ने किसानों पर गोलिया चलाई, जिसमें झण्डा गीत गाते हुए नानकजी भील शहीद हो गए। कुछ समय बाद माणिकलाल वर्मा ने इसका नेतृत्व किया। यह आंदोलन 17 वर्षं तक चला एवं 1943 में समाप्त हो गया।

दूधवा-खारा किसान आंदोलन (1946-47) :-बीकानेर रियासत के चुरू में हुआ। आंदोलन का कारण जमींदारों का अत्याचार था। इस समय बीकानेर के शासक शार्दुलसिंजी (गंगासिंहजी के पुत्र) थे। इस आंदोलन का नेतृत्व रघुवरदयाल गोयल, वैद्य मघाराम, हनुमानसिंह आर्य के द्वारा किया गया।

मातृकुण्डिया किसान आंदोलन (चित्तौड़गढ़) :- 22 जून, 1880 में हुआ। यह एक जाट किसान आंदोलन था। इसका मुख्य कारण नई भू-राजस्व व्यवस्था थी। इस समय मेवाड़ के शासक महाराणा फतेहसिंह थे।

मेव किसान आंदोलन (1931) :- यह अलवर व भरतपुर (मेवात) में हुआ। अलवर, भरतपुर के मेव बाहुल्य क्षेत्र को मेवात कहते हैं। यह लगान विरोधी आंदोलन था। आंदोलन का नेतृत्व मोहम्मद अली के द्वारा किया गया।

किषोरीदेवी (25 अप्रैल, 1934) :- सीकर के कटराथल नामक स्थान पर सरदार हरलालसिंह की पत्नि किषोरदेवी के नेतृत्व में जाट महिलाओं का एक सम्मेलन बुलाया गया। जिसमें लगभग 10,000 महिलाओं ने भाग लिया। श्रीमती रमादेवी, श्रीमती दुर्गादेवी, श्रीमती उत्तमादेवी ने इस आंदोलन में सक्रिय भाग लिया था। किषोरीदेवी के प्रयासों से शेखवाटी क्षेत्र में राजनैतिक चेतना जागृत हुई।

Rajasthan Geography Hand Writing Notes PDF:- Buy Now
Computer Digital Notes PDF:- Buy Now

जयसिंहपुरा किसान हत्याकाण्ड (1934) :- यह 21 जून, 1934 को डूंडलोद के ठाकुर के भाई ने खेत जोत रहे किसानों पर गोलिया चलाई, जिसमें अनेक किसान शहीद हुए। ठाकुर के भाई ईष्वरसिंह पर मुकदमा चलाया गया।

शेखावटी किसान आंदोलन (1925) :- यह आंदोलन पलथाना, कटराथल, गोधरा, कुन्दनगांव आदि गांवों में फैला हुआ था। खुड़ी गांव और कुन्दन गांव में पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही में अनेक किसान मारे गये। शेखावटी किसान आंदोलन में जयपुर प्रजामण्डल का योगदान था। 1946 में हीरालाल शास्त्री के माध्यम से आंदोलन समाप्त हुआ।

जनजाति आंदोलन :- भगत आंदोलन/गोविन्दगिरी आंदोलन (1883):-भील, आदिवासी संन्यासियों को भगत कहा जाता था।यह आंदोलन आदिवासी भील बाहुल्य डुंगरपुर और बांसवाड़ा में हुआ था। गोविन्दगिरी के द्वारा भीलों में व्याप्त बुराईयों, कुप्रथाओं को दूर करने के लिए एवं भीलों में राजनैतिक चेतना जागृत करने के लिए 1883 में संप (भाईचारा या सम्पत) सभा की स्थापना की एवं धूणी की स्थापना की जहां गोविन्दगिरी ने भीलों को उपदेष दियें।गोविन्दगिरी दयानन्द सरस्वती की विचारधारा से प्रेरित थे। इन्होने बांसवाड़ा की मानगढ़ की पहाड़ी को अपनी कर्मभूमि बनाया।7 दिसम्बर, 1908 को हजारों की संख्या में भील इस पहाड़ी पर इकटठे हुए। पुलिस के द्वारा इन पर गोलियां चलाई गई, जिसमंे लगभग 1500 भील मारे गए। प्रतिवर्ष इस स्थान पर अष्विन शुक्ल पूर्णिमा को मेला भरता हैं। ब्रिटिष सरकार और रियासत के द्वारा इस आंदोलन को दबा दिया गया।

एकी आंदोलन/भोमट भील आंदोलन (1921-23) :- इस आंदोलन का सुत्रपात मोतीलाल तेजावत ने किया था। इन्हे आदिवासियों का मसीहा कहा जाता हैं। मोतीलाल तेजावत का जन्म उदयपुर के कोलियार गांव में एक ओसवाल परिवार में हुआ था। इस आंदोलन का प्रमुख कारण भीलों में व्याप्त असंतोष था। असंतोष के कारण निम्न थे भीलों में व्याप्त सामाजिक बुराईयां व उनकी प्रथाओं पर ब्रिटिष सरकार ने रोक लगा दी थी। तम्बाकू, अफीम और नमक पर कर लगाए गए। यदि भील कर नहीं चुकाता तो उसे खेती नहीं करने दी जाती थी। भीलों से लाभ और बेगार लेने के लिए क्रुरतापूर्वक व्यवहार किया जाता था। मोतीलाल तेजावत ने सभी भीलों को एकत्रित कर इस आंदोलन का श्रीगणेष 1921 में झाड़ोल और फालसिया से किया था। 1922 में तेजावत ने नीमड़ा गांव में भीलों का एक सम्मेलन बुलाया। जिसकी घेराबंदी ब्रिटिष सरकार ने की व अंधाधुंध गेालियां चलाई। निमड़ाकाण्ड को दूसरा जिलयांवाला काण्ड कहते हैं।तेजावत भूमिगत हो गए। 1929 में

मोतीलाल तेजावत ने महात्मा गांधी की प्रेरणा से :- भीलों के लिए कार्य किये और ‘‘वनवासी संघ’’ नामक संस्था की सन् 1936 में स्थापना की। इस संघ के मुख्य सदस्य मोतीलाल पाण्ड्य (बांगड़ का गांधी),माणिक्यलाल वर्मा और मोतीलाल तेजावत थे। मीणा आंदोलन (1930) यह जयपुर रियासत में हुआ।इसका कारण 1924 में ब्रिटिष सरकार ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट बनाया तथा 1930 में जयपुर राज्य में जरायम पेषा कानून बनाया जिसमें मीणाओं को अपराधी जाति घोषित कर दिया और इन्हें दैनिक रूप से निकटतम थाने में उपस्थिति दर्ज करवाना अनिवार्य कर दिया। मीणाओं ने इसका विरोध किया और संघर्षं के लिए 1933 मीणा क्षत्रिय महासभा का गठन , मीणा जाति सुधार कमिटी का गठन किया और 1944 में मुनि मगर सागर की अध्यक्षता में नीमका थाना में एक सम्मेलन बुलाया और 1946 में स्त्रियों और बच्चों को इस कानून से मुक्त कर दिया। 28 अक्टूबर, 1946 को बागावास में मीणाओं ने सम्मेलन बुलाया औरचौकीदारी के काम से इस्तीफा दे दिया।आजादी के बाद 1952 में जरायम पेशा कानून पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया गया।

मीणा आंदोलन :- 1924 के क्रिमिनल ट्रॉइब्स एक्ट 1930 के जरायम पेशा कानून के द्वारा प्रत्येक मीणा जाति के व्यक्ति को रोजना नजदीकी थाने में उपस्थित दर्ज करानी होती थी , मीणा जाति के उत्थान के लिए 1944 में नीम का थाना ( सीकर ) जेन मुनि मगन सागर (मीणा जाति के गुरू) ने मीणा सम्मेलन की अध्यक्षता की जेन मुनि मगन सागर ने राज्य मीणा सुधार समिति का गठन किया 31 दिसम्बर 1 945 को अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के उदयपुर मे छठा अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की , इस अधिवेशन में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट की निंदा की गई

भगत आंदोलन :- भगत आंदोलन की शुरूआत गुरू गोबिन्द गिरी ने की , गुरू गोबिन्द गिरी को भीलों का प्रथम उद्धारक कहा जाता हे , गुरू गोबिन्द गिरी का जन्म 20 अक्टूबर 1858 में डूंगरपुर के बासिया गाँव में एक बंजारा परिवार में हुआ , ये दयानंद सरस्वती से प्रेरित होकर आदिवासियों की सेवा में लगे , भगत आन्दोलन भीलों के सामाजिक उत्थान के लिए किया गया पहला आदोलन था, भीलों को शोषण के विरूद्ध संगठित करने तथा भीलों की सामाजिक कुरितियों को दूर करने के लिए 1883 ईस्वी मे गोविंद गिरी ने सिरोही में सम्पसभा की स्थापना की , गुरू गोविंद गिरि ने सम्पसभा का प्रथम अधिवेशन सन 1903 में मानगढ़ की पहाडी भूखिया गांव ( बाँसवाड़ा ) के पास किया और प्रतिवर्ष यह अधिवेशन आश्विन शुक्ल को इसी पहाडी पर होने लगा , 7 दिसम्बर 1908 को मार्गशीर्ष पूर्णिमा को मानगढ़ पहाडी पर अंग्रेजों द्वारा फायरिंग में 1500 भील मारे गए , मानगढ़ हत्याकांड को राजस्थान का जलिथावाला हत्याकाण्ड भी कहा जाता है , 1913 से मानगढ़ पहाडी पर मानगढ़ धाम का मेला लगता है, जो आश्विन पूर्णिमा को भरता है ।

दोस्तों यह Rajasthan GK (Raj GK )याद करने का सबसे आसान तरीका है इस पोस्ट से आप राजस्थान के जनजातीय आंदोलन को प्वाइंट to प्वाइंट आसानी से पढ़कर याद कर सकते हैं अगर आपको हमारी पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों को जरूर शेयर करना

Rajasthan Geography Question Bank:- Buy Now   
  Rajasthan History Question Bank:- Buy Now    
  Rajasthan Arts And Culture Questions Bank:- Buy Now   
  Indian Geography Question Bank:- Buy Now   
  Indian History Question Bank:- Buy Now   
  General Science Questions Bank:- Buy Now
Join WhatsApp Group
Follow On Instagram 
Subscribe YouTube Channel
Subscribe Telegram Channel

Treading

Load More...