राजस्थान का एकीकरण

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राजस्थान का एकीकरण

राजस्थान का एकीकरण :- हमारा देश भारत 15 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउण्टबेटेन की रिपोर्ट के आधार पर आजाद हुआ था। यह रिपोर्ट 3 जून 1947 को ब्रिटेन की संसद में रखी गई थी तथा यह रिपोर्ट 18 जुलाई 1947 को पारित हुई। 18 जुलाई को पारित होने के बावजूद भी हमारे देश की आजादी की तारीख 15 अगस्त निष्चित की गई थी। 15 अगस्त इसलिए तय की गई कि इस दिन जापान ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण किया था। जापान के हिरोशिमा पर 6 अगस्त 1945 को तथा नागासाकी पर 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने परमाणु बम गिराये थे।

माउण्टबेटेन रिपोर्ट में यहाँ की रियासतों के सामने तीन विकल्प रखे गये :-
भारत में शामिल हो सकती हैं, पाकिस्तान में शामिल हो सकती है, आजाद रह सकती हैं।
इन विकल्पों के कारण अनेक देशों का निर्माण हो सकता था, भारत के अनेक टुकड़े होने से बचाने के लिए भारत का एकीकरण किया गया था, एकीकरण के लिए रियासत अयोग का गठन 5 जुलाई 1947 को किया था, जिसका अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल को बनाया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल को लौहपुरूष व भारत का बिस्मार्क कहा जाता हैं। रियासत आयोग का सचिव वी.पी.मेनन को बनाया गया जो उस समय माउंटबेटेन का संवैधानिक सलाहकार था। एकीकरण के दौरान राजस्थान में कुल 19 रियासतें 3 ठिकाने तथा 1 केन्द्रशासित प्रदेश था, 19 में से एकमात्र रियासत मुस्लिमों की नवाबों की नगरी टोंक थी, जबकि धौलपुर व भरतपुर जाटों की थी। एकीकरण के दौरान अधिकांश रियासतें राजपूतों की थी इसलिए राजस्थान को राजपूताना भी कहा जाता था।

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प्रथम चरण :- मत्स्य संघ – मत्स्य संघ का निर्माण ,स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन होना दुर्भाग्यपूर्ण रहा। इस विभाजन के साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में साम्प्रदायिक दंगे भङक उठे थे। इन दंगों का सीधा प्रभाव राजस्थान की अलवर और भरतपुर रियासतों पर पङा। क्योंकि यहां पर मुसलमानों व मेव जाति का ज्यादा प्रभाव था। अलवर के दीवान बी.एन. खरे व महाराज तेजसिंह थे। केन्द्र सरकार ने अलवर के महाराजा व दीवान को अपने राज्य में साम्प्रदायिक शांति व कानून व्यवस्था बनाने के लिए जोर दिया और कहा कि अगर आपसे प्रशासन नहीं सम्भाला जा रहा है तो अलवर का प्रशासन केन्द्र को सौंप दीजिए, लेकिन अलवर के महाराजा व दीवान ने आग्रह किया कि कुछ दिनों में ही सारी स्थितियों कों सामान्य कर दिया जाएगा।

द्वितीय चरण :- पूर्व राजस्थान – इस चरण का गठन 25 मार्च 1948 को 9 नई रियासतों को मिलाकर किया गया- कीको बाबू झाडू प्रशाटो (किशनगढ, कोटा, बांसवाड़ा, बूँदी, झालावाड़, डूँगरपुर, प्रतापगढ़, शाहपुरा, टोंक), टोंक में स्थित लावा तथा बाँसवाड़ा में स्थित कुशलगढ़ ठिकाने को भी इसी चरण में शामिल किया गया था।, इस चरण की राजधानी कोटा थी तथा राजप्रमुख कोटा के भीमसिंह, उपराजप्रमुख बूँदी के बहादुर सिंह थे, इस चरण का उद्घाटन कोटा दुर्ग में एन.वी.गॉडगिल ने किया था। इस चरण के प्रधानमन्त्री गोकुललाल असावा बने थे।

तृतीय चरण :- संयुक्त राजस्थान – इस चरण का गठन 18 अप्रैल 1948 को उदयपुर को पूर्व राजस्थान में शामिल करके किया गया था, इस चरण की राजधानी भी उदयपुर ही रखी गई थी, तथा इस चरण का राजप्रमुख मेवाड़ का शासक महाराणा भूपाल सिंह बना था, इस चरण का प्रधानमन्त्री माणिक्यलाल वर्मा था, तथा उद्घाटन जवाहरलाल नेहरू ने किया था।, इस चरण का उपराजप्रमुख कोटा का भीमसिंह बना था।

चर्तुथ चरण :- वृहद राजस्थान – इस चरण का गठन 30 मार्च, 1949 को जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर व बीकानेर चार बड़ी रियासतों को संयुक्त राजस्थान में शामिल करके किया गया था, इस चरण को विशाल राजस्थान भी कहा जाता हैं, इस चरण का उद्घाटन सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जयपुर के सिटी पैलेस में किया था, वृहत राजस्थान की राजधानी जयपुर को रखा गया था तथा इस चरण का राजप्रमुख मानसिंह द्वितीय को बनाया गया था, इस चरण का प्रधानमन्त्री हीरालाल शास्त्री बना था। इस चरण में महाराजप्रमुख महाराणा भूपालसिंह को बनाया गया था, जबकि उपराजप्रमुख कोटा निवासी भीमसिंह ही था, वृहद राजस्थान की राजधानी जयपुर को श्री पी. सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिश पर बनाया गया था।

पंचम चरण :- संयुक्त वृहत राजस्थान – 15 मई 1949 को वृहत राजस्थान में मत्स्य संघ को मिलाकर संयुक्त वृहत राजस्थान का गठन किया गया था, इस चरण का राजप्रमुख सवाईमानसिंह द्वितीय ही बना था तथा राजधानी भी जयपुर को ही रखा गया था, इस चरण के प्रधानमन्त्री हीरालाल शास्त्री ही थे जबकि उपराजप्रमुख कोटा के महाराव भीमसिंह थे।

षष्ठम चरण :- राजस्थान संघ – 26 जनवरी, 1950 को इस चरण का गठन संयुक्त वृहत राजस्थान में सिरोही को शामिल करने पर हुआ था, इस चरण के वक्त ही संयुक्त वृहत राजस्थान के प्रधानमन्त्री हीरालाल शास्त्री को प्रधानमन्त्री के स्थान पर मुख्यमन्त्री बनाया गया था, राजस्थान में इस समय राज्यपाल का पद सृजित नहीं होने के कारण यहाँ पर हीरालाल शास्त्री को शपथ राजप्रमुख मानसिंह द्वितीय ने दिलाई थी, इस चरण की भी राजधानी जयपुर थी।

सप्तम् चरण : राजस्थान – वर्तमान राजस्थान का स्वरूप 1 नवम्बर 1956, को प्राप्त हुआ था। 7वें चरण में राजस्थान संघ में अजमेर मेरवाड़ा व आबूदेलवाड़ा को शामिल किया गया था, इस चरण की भी राजधानी जयपुर ही थी, इस चरण में मध्यप्रदेश का सुनेलटप्पा राजस्थान में मिलाया गया था जो वर्तमान में कोटा में हैं, तथा सुनेलटप्पा के बदले में राजस्थान के झालावाड़ जिले का सिरौंज भाग मध्यप्रदेश को दिया गया था, इस चरण में राजप्रमुख के स्थान पर राजस्थान का प्रथम राज्यपाल गुरूमुखनिहाल सिंह बना था। एकीकरण पूर्ण होते वक्त राजस्थान में अजमेर सहित 26 जिले थे।
विशेष – राजस्थान का 27 वाँ जिला धौलपुर 15 अप्रैल 1982 को भरतपुर से, 28 वाँ बारां 10 अप्रैल 1991 को कोटा से, 29 वाँ दौसा 10 अप्रैल 1991 को जयपुर से, 30 वाँ राजसमन्द 10 अप्रैल 1991 को उदयपुर से, 31 वाँ हनुमानगढ़ 12 जुलाई 1994 को गंगानगर से, 32 वाँ करौली 19 जुलाई 1997 को सवाईमाधोपुर से, तथा 33 वाँ जिला प्रतापगढ़ 26 जनवरी 2008 को चितौड़गढ़, उदयपुर व बांसवाड़ा से बना था।

राजस्थान के एकीकरण के बारे में स्मरणीय तथ्य :-
मनोनीत मुख्यमंत्री – हीरालाल शास्त्री (शास्त्री द्वारा लिखित लोकप्रिय गीतः प्रलय प्रतीक्षा नमो नमः), सी. एस. वेंकटाचार्य – एकमात्र सी. एम. जो आई. सी. एस. अधिकारी था, जयनारायण व्यास – निर्वाचित व मनोनीत, प्रथम निर्वाचित सी. एम. दौसा निवासी- टीकाराम पालीवाल (3.3.1952 से 1.11.1953),

पूर्ण एकीकरण 1956 के दौरान मुख्यमंत्री – मोहनलाल सुखाड़िया (कार्यकाल सबसे लम्बा- लगभग 17 वर्ष, सर्वाधिक चार बार, 13 मार्च, 1967 से 26 अप्रेल, 1967) राज्य के चौथे विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के कारण राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन लागू। मोहनलाल सुखाडिया ने 1962 में संभागीय व्यवस्था समाप्त कर दी थी। संभागीय व्यवस्था 1 जनवरी, 1987 को छठा संभाग अजमेर बनाकर हरिदेव जोशी ने शुरू की, हरिदेव जोशी तीन बार मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। राज्य के नवीनतम संभाग का गठन (भरतपुर) 4 जून, 2005 को किया गया, जो क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा व सबसे कम लिंगानुपात वाला संभाग हैं, राजस्थान में राज्यपाल का पद 1 नवम्बर, 1956 को सृजित हुआ – प्रथम राज्यपाल सरदार गुरूमुख निहालसिंह थे, प्रथम चरण का नाम मत्स्य संघ के. एम. मुशी के कहने पर रखा गया जिसका विरोध भरतपुर के राजकुमार मानसिंह देशराज ने किया, राजस्थान शब्द का प्रयोग एकीकरण के दूसरे चरण में हुआ, परन्तु केन्द्र सरकार द्वारा राजस्थान को राजस्थान शब्द की मान्यता 26 जनवरी, 1950 को प्रदान की गई , समाजवादी दल के नेता जयप्रकाश नारायण ने सर्वप्रथम 9 नवम्बर, 1948 को अविलम्ब वृहत राजस्थान की मांग की जो 30 मार्च 1949 को पूर्ण हुई थी, इसलिए 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाता है।

रियासत का नाम – शासक का नाम – वंश :-
1) उदयपुर – महाराणा भूपालसिंह – सिसोदिया
2) जोधपुर – महाराजा हनुवंतसिंह – राठौड़
3) जयपुर – सवाई जयसिंह द्वितीय – कच्छवाहा
4) जैसलमेर – रघुनाथ सिंह बहादुर – भाटी
5) बीकानेर – शार्दूलसिंह – राठौड़
6) सिरोही – अभयसिंह देवड़ा – (चौहान)
7) किशनगढ़ – सुमेरसिंह – राठौड़
8) टोंक – अजीजउद्दौला – पिण्डारी (मुसलमान)
9) भरतपुर – बृजेन्द्रसिंह – जाट
10) अलवर – तेजसिंह – कच्छवाहा
11) करौली – गणेशपाल देव – यदुवंशी
12) धोलपुर – उदयभानसिंह – जाट
13) बूँदी – बहादुरसिंह हाड़ा – चौहान
14) कोटा – भीमसिंह हाड़ा – चौहान
15) बाँसवाड़ा – चन्द्रवीरसिंह – सिसोदिया
16) झालावाड़ – हरिशचन्द्र बहादुर – झाला
17) प्रतापगढ़ – अम्बिका प्रतापसिंह – सिसोदिया
18) डूंगरपुर – लक्ष्मणसिंह – सिसोदिया
19) शाहपुरा – राजा सुदर्शन देव – सिसोदिया
20) नीमराना – राजा राजेन्द्रसिंह – कच्छवाहा
21) लावा – ठाकुर बंसप्रदीपसिंह – नरूका
22) कुशलगढ़ – हरेन्द्र कुमार सिंह – राठौड़

महात्मा गांधी की हत्या :- लेकिन 30 जनवरी, 1948 का दिल्ली में महात्मा गांधी का हत्या नाथूराम गोडसे के द्वारा कर दी जाती है। नाथूराम गोडसे हिन्दु महासभा के कार्यकर्ता थे। डाॅ. बी. एन. खरे के सम्बन्ध में यह अफवाह फैली की डाॅ. खरे हिन्दू महासभा के सक्रिय कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का केन्द्र बना है तथा अलवर राज्य में गांधी की हत्या के लिए उत्तरदायी कुछ षडयंत्रकारियों को शरण भी प्रदान की हैं।

भरतपुर में भी साम्प्रदायिक दंगे :- उधर भरतपुर में भी साम्प्रदायिक दंगों से भारत सरकार काफी चिंतित थीं। भरतपुर के खिलाफ केन्द्र कोई कार्यवाही करता इससे पहले ही भरतपुर के महाराजा ब्रिजेन्द्रसिंह केन्द्र से आग्रह करते हैं कि भरतपुर का प्रशासन केन्द्र अपने केन्द्र से आग्रह करते हैं कि भरतपुर का प्रशासन केन्द्र अपने केन्द्र अपने हाथों में ले ले।

वृहत् राजस्थान 30 मार्च, 1949 :- संयुक्त राजस्थान में बीकानेर, जयपुर, जैसलमेर व जोधपुर को मिलाकर वृहत राजस्थान का निर्माण किया गया था। इन चारों रियासतों के विलय में सरदार वल्लभ भाई पटेल व वी. पी. मेनन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थीं, इनमें सरकार द्वारा निर्धारित मापदंड को पूरा करती थी। यानी की वो अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रख सकती थीं। ऐसी परिस्थिति में भारत सरकार ने अत्यंत सावधानी से कार्य किया। विलय के लिए जोधपुर बीकानेर और जैसलमेर के शासकों को समझाया गया कि इन राज्यों की सीमाएं पाकिस्तान से मिली हुई हैं। जहां से सैदव आक्रमण का भय बना रहता है। फिर इन तीन राज्यों का बहुत बङा क्षेत्र थार के रेगिस्तान का अंग था। तथा यातायात एवं संचार के साधनों की दृष्टि से भी यह क्षेत्र काफी पिछङा हुआ था।

Rajasthan History Notes

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