राजस्थान भूगोल

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राजस्थान भूगोल

राजस्थान भूगोल :-
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राजस्थान प्राकृतिक वनस्पति एंव वन संसाधन :-
ऐतिहासिक नगर जैसलमेर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर आकलन मे wood fossil पार्क मे मौजूद fossils को संरक्षित करने ,इन्हें बेहतर तरीके से प्रदर्शित करने एवं पर्यटन की आधार भूत सुविधाओं के विकास का कार्य किया जायेगा।
जैसलमेर मे भारत सरकार के सहयोग से गोडावण Great Indian Bustard (GIB) को संरक्षित करने के लिये ब्रीडिंग सेटर खोलने की कार्यवाही की जा रही हैं।
प्रदेश मे Tiger एवं leopard के संरक्षण तथा वन्य क्षेत्रो मे शिकार एवं अन्य अवैध गतिविधियों की रोकथाम हेतु रंणथभौर, सरिस्का, जवाई तथा मुकंदरा वन्यजीव अभयारण्यों एवं झालाना आरक्षित वनक्षेत्र मे सुरक्षा हेतु IT Security System लगाये जाने की घोषणा की गई हैं।
मांउट आबू स्थित Trevor’s Tank. को ECo-tourism के दृष्टिकोण से विकसित किया जायेगा। चूरु जिला मुख्यालय पर नेचर पार्क विकसित किया जाना भी प्रस्तावित हैं। बीकानेर मे ‘बीछवाल बायोलॉजिकल पार्क की स्थापना की घोषणा की हैं।
अग्रेजी शासन से पहले भारत मे जनता द्रारा जंगलों का इस्तेमाल मुख्यत: स्थानीय रीति-रिवाजो के अनुसार होता था। भारत मे सबसे पहले लार्ड डलहौजी ने 1855 मे एक वन नीति घोषित की जिसके अन्तर्गत यह कहा गया कि राज्य के वन क्षेत्र मे जो भी इमारती लकड़ी के पेड हैं वे सरकार के हैं और उन पर किसी व्यक्ति का कोई अधिकार या दावा नही है।इस नीति को अमल मे लाने के लिए एक वन विभाग की स्थापना की गई।
इस प्रकार भारत मे वनो पर सरकारी सत्ता की शुरुआत हुई। इस सत्ता को सुदृढ़ बनाने एव लोगों को वनो पर परम्परागत अधिकारो से वंचित करने के लिए अनेक वन कानूनों एवं वन-नीतियों का निर्माण किया गया।जो निम्न प्रकार है।

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1865 का पहला वन कानून :-
1878 का वन कानून
1894की पहली वन नीति
भारतीय वन अधिनियम 1927
राष्टीय वन नीति-1952
फाॅरेस्ट कंजर्वेशन आडिनेंस एक्ट ( वन.संरक्षण अधिनियम )-1980
नयी राष्ट्रीय वन नीति-1988
संविधान 42वें संशोधन 1976 के द्रारा वनों का विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची मे लाया गया।
केन्द्रीय वन अनुसंधान संस्थान ,(देहरादून) -भारतीय वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत 1981 मे केन्द्रीय वन अनुसंधान संस्थान देहरादून की स्थापना की गई। इसके चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं-शिमला, कोलकाता, नागपुर एवं बंगलौर।
अधिनियम के तहत :’केन्द्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान, लखनऊ’ की स्थापना की गई। ये संस्थान पर्यावरण एंव वन मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कार्य करते हैं।

राज्य के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के स्थानीय नाम :-
1) छप्पन का मैदान- क्षेत्र में Dungarpur बांसवाड़ा जिले का दक्षिणावर्ती समप्राय क्षेत्र आता है इस मैदान पर सोम कागदर माही कमला जाखम सावरमती आदि नदियों का या उनकी ऊपरी शाखाओ अथवा नालो का अथार्थ 56 नदी नालों का जल प्रभावित होने के कारण इसे 56 या छप्पनिया का मैदान कहा जाता है
2) बांगड़/वाग्वरांचल- अरावली पर्वतीय श्रंखलाओं में स्थित डूंगरपुर और बांसवाडा को बांगड़ कहा जाता है इस क्षेत्र में आदिवासी निवास करते हैं सघन वन अच्छी वर्षा समशीतोष्ण जलवायु( Temperate climate) वाला यह प्रदेश खनिज संपदा और सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न है बांगड़ क्षेत्र राजस्थानी और गुजराती का मिश्रण रूप और डिंगल भाषा का प्रचलन होने के कारण इसे बांगड़ी अथवा बांगड़ भाषा का क्षेत्र भी कहते हैं
3) विंध्यन बेसिन- राज्य के दक्षिणी पूर्वी भाग में 50000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस बेसिन में कोटा झालावाड़ बॉरा बूंदी के साथ ही Sawai madhopur धोलपुर और भीलवाड़ा जिले का कुछ क्षेत्र आता है
4) मेवाड-़ उदयपुर पूर्वी राजसमंद चित्तौड़ और पश्चिमी भीलवाड़ा जिलों के मुख्यत: पहाड़ी और उच्च भाग मेवाड़ क्षेत्र के तहत सम्मिलित है मेवाड़ रियासत का इस भूभाग पर नियंत्रण होने से इसे मेवाड़ के नाम से पुकारा जाने लगा
5) मेरवाड़ा- क्षेत्र अजमेर जिले के अधिकांश भाग और दिवेर राजसमंद व टाटगढ पर विस्तृत है
6) भोमठ क्षेत्र- के अंतर्गत डूंगरपुर पूर्वी सिरोही उदयपुर जिलो का अरावली पर्वतीय क्षेत्र सम्मिलित है
7) मारवाड- अरावली पर्वत श्रंखला के पश्चिम में स्थित बीकानेर जोधपुर नागौर को मध्यकाल में मारवाड़ कहा जाता था इस क्षेत्र पर मध्य काल में राठौर शासकों का शासन रहा यह क्षेत्र जलाभाव रेतीली मिट्टी ( Sandy soil) उच्च तापांतर कम वर्षा और वनस्पति विहीन है
8) अर्बुदा- अरावली पर्वत श्रंखला का नाम अर्बुदा भी है यह पर्वत श्रंखला विश्व की सबसे प्राचीन श्रृंखला है यह गुजरात के पालनपुर से दिल्ली तक फैली हुई है इसकी कुल लंबाई 692 किलोमीटर है राजस्थान में इसकी कुल लंबाई 550 किलोमीटर है यह राज्य के कुल 12 जिलों में फैली हुई है
9) भोराठ का पठार- इस क्षेत्र के अंतर्गत मुकेश अरावली श्रृंखला के पश्चिमी पहाड़ी भाग आते हैं जो उदयपुर जिले की गोगुंदा धरियावाद ईसवाल और राजसमंद जिले के कुंभलगढ़ भू-भागो पर विस्तृत है
10) हाड़ौती का पठार- इस प्रदेश के अंतर्गत बूंदी कोटा झालावाड़ और बॉरा सम्मिलित है ।मालवा पठार उत्तरी विस्तार जहां हाड़ा वंश का राज्य रहा हाडोती के पठार के नाम से पुकारा जाने लगा

रणथम्भौर राष्ट्रीय उधान (Ranthambore national park) :-
रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान’ राजस्थान स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है।
यह अभयारण्य अपनी खूबसूरती, विशाल परिक्षेत्र और बाघों की
प्रसिद्धिबाघ संरक्षित क्षेत्र
रणथंभौर वन्यजीव अभयारण्य दुनिया भर में बाघों की मौजूदगी के कारण जाना जाता है और भारत में इन जंगल के राजाओं को देखने के लिए भी यह अभयारण्य सबसे अच्छा स्थल माना जाता है।
विवरण – रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान के सवाईमाधोपुर ज़िले में स्थित है। यह उत्तर भारत के बड़े राष्ट्रीय उद्यानों में गिना जाता है। 392 वर्ग किलोमीटर में फैले इस उद्यान में अधिक संख्या में बरगद के पेड़ दिखाई देते हैं। यह उद्यान बाघ संरक्षित क्षेत्र है। यह राष्ट्रीय अभयारण्य अपनी खूबसूरती, विशाल परिक्षेत्र और बाघों की मौजूदगी के कारण विश्व प्रसिद्ध है। अभयारण्य के साथ-साथ यहाँ का ऐतिहासिक दुर्ग भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। लंबे समय से यह राष्ट्रीय उद्यान और इसके नजदीक स्थित रणथंभौर दुर्ग पर्यटकों को विशेष रूप से प्रभावित करता है।

मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान :-
स्थापना – नवंबर 1955 (अभयारण्य के रूप में)|
अभयारण्य क्षेत्र का नाम मुकुंदरा की पहाड़ियां जिनका
नाम कोटा के प्रसिद्ध प्रकृति प्रेमी हाडा शासक मुकुंद सिंह के नाम पर रखा गया|
दर्रा वन्य जीव अभयारण्य जिसका नाम 2003 में दर्रा अभयारण्य से बदलकर Rajiv gandhi national park रखा
किया परंतु इस प्रस्ताव को केंद्र ने मंजूरी नहीं दी|
Mukundra Hills को राष्ट्रीय पार्क का दर्जा देने के लिए 9 जनवरी 2012 को अधिसूचना जारी की| [ जवाहर सागर अभयारण्य, चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य, दर्रा अभयारण्य के कुछ भाग (लगभग 199.51km² क्षेत्र )को मिलाकर राज्य का तीसरा National Park बनाने की घोषणा की|
10 अप्रैल 2013 को Tiger reserve घोषित किया गया|
राजस्थान का तीसरा टाइगर रिजर्व

राष्ट्रीय मरू उद्यान जैसलमेर :-
भारत में वन्य जीवों ( Wild animals) के संरक्षण के लिए सर्वप्रथम लिखित कानून
बनाने वाला शासक मौर्य सम्राट अशोक ( Ashok) था जिसने ईसा पूर्व तीसरी
आधुनिक भारत में वन्यजीव संरक्षण ( Wildlife Reserve) हेतु बनाया गया प्रथम
अधिनियम- भारतीय पशु पक्षी संरक्षण अधिनियम – 1887
मूल संविधान में वन्यजीव विषय राज्य सूची का विषय था !
42वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा वन्यजीव विषय को
राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल किया गया!

सीता माता अभ्यारण्य – प्रतापगढ़ –
स्थापना 1979 में
क्षेत्रफल 422.95 वर्ग किलोमीटर
उपनाम उड़न गिलहरियों का स्वर्ग
चितल की मातृभूमि
यह अभ्यारण्य राजस्थान के दक्षिण पश्चिम में Pratapgarh जिले में स्थित है
जहां भारत की तीन पर्वत मालाएं अरावली विंध्याचल और मालवा का पठार
आपस में मिलकर ऊंचे सागवान वनों ( Green forests) की उत्तर पश्चिमी सीमा बनाते है
Rajasthan के एकमात्र इसी अभयारण्य में सागवान वनस्पति पाई जाती है
कर्ममोई (कर्म मोचनी) नदी का उद्गम स्थल सीता माता अभ्यारण्य है
इसके अलावा जाखम टांकिया भूदो तथा नालेश्वर नमक नदियां इसी
अभयारण्य से होकर बहती है

केवलादेव नेशनल पार्क :- भरतपुर
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-
पूर्वी राजस्थान जयपुर की दक्षिण पूर्व में स्थित है
जिसे घना पक्षी विहार भी जाता है
Note:- यह अभयारण्य भारत के प्रमुख पर्यटन परिपथ
सुनहरा त्रिकोण एवं राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highway) NH 11 पर राजस्थान
पर स्थित है|
IMP इसका निर्माण किसन सिंह ने स्विजरलैंड की झीलों ( Switzerland lakes)
के आधार पर करवाया इसे 1956 में पक्षी अभ्यारण का तथा
26 अगस्त 1981 में राष्ट्रीय उद्यान दर्जा प्राप्त हुआ |
1985 में इसे UNESCO द्वारा विश्व प्राकृतिक धरोवर की सूची
में शामिल किया गया |
उपनाम- पक्षियों का स्वर्ग
NOTE:- इस अभयारण्य के बीचों बीच भगवान केवलादेव
का मंदिर है इसी के आधार पर इसका नाम केवलादेव रखा गया |
एशिया की सबसे बड़ी प्रजनन स्थली
Imp:- इसे रामसर कन्वेशन के तहत रामसर कन्वेशन
वैट लैण्ड में शामिल किया जा चुका है |
यह लगभग 29 किलोमीटर में फैला है
की पूर्वी द्वार भरतपुर में गंभीरी – बाणगंगा नदीयों के संगम

इन्दिरा गांधी नहर :-
‘इंदिरा गाँधी नहर’ भारत की महत्त्वपूर्ण सिंचाई परियोजना ( Irrigation project) है।
यह भारत ही नहीं अपितु विश्व की सबसे लम्बी नहर है, जिसने राजस्थान में ‘हरित क्रांति’ ( Green revolution) ला दी है।
महत्वपूर्ण बिंदु
देश- भारत
स्रोत- हरिके बाँध, पंजाब
लम्बाई – 649 किलोमीटर
जल विसर्जन- 18,500 घनफुट/सेकंड
लोकार्पण- 31 मार्च, 1958
उद्घाटनकर्ता- गोविन्द वल्लभ पंत
इस विशाल नहर की कल्पना सबसे पहले 1948 में तत्कालीन बीकानेर राज्य के सचिव एवं मुख्य अभियन्ता स्वर्गीय श्री कंवरसेन द्वारा की गई और उन्होंने इसकी योजना बनाई।

Sambhar Lake ( सांभर झील ) :-
खारे पानी की झीलें मुख्यत – टेथिस सागर के अवशेष का परिणाम है इसका एक उदाहरण साम्भर झील के रूप मे है। रेगिस्तान में खारे पानी की झीलों को प्लाया तथा तटीय इलाकों में खारे पानी की झीलों को कयाल/लेंगून कहते हैं ।
भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील चिल्का झील उड़ीसा है। भारत की दूसरी सबसे बड़ी व राज्य की सबसे बड़ी खारे पानी की झील सांभर झील जयपुर हैं। सांभर राज्य का सबसे बड़ा नमक उत्पादन केंद्र एवं एशिया का सबसे बड़ा अंत स्थलीय नमक उत्पादन केंद्र है।
सांभर झील जयपुर से 70 किमी. दूर फुलेरा नामक स्थान पर 27° उत्तरी अक्षांश से 29° उत्तरी अक्षांश तथा 74° पूर्वी देशांतर से 75° पूर्वी देशांतर के बीच अवस्थित है।

आन्तरिक प्रवाह की नदियाँ :-
काकनेय/काकनी नदी
उद्गम- Jaisalmer के कोटड़ी गॉव से होता है
जैसलमेर मे बुझ झील को जल देने के पश्चात मीठा खाड़ी नामक स्थान पर विलुप्त हो जाती है!
उपनाम
काकनेय,काकनी,मसुरदी।
कांतली नदी –
उद्गम – सीकर जिले की खण्डेला पहाड़ियों से होता है ।
सीकर मे बहने के पश्चात झुंझुनू मे बहती हुई मन्दरेला नामक स्थान पर विलुप्त हो जाती है
यह नदी झुंझुनू जिले (Jhunjhunu district) को दो भागो मे बांटती है
इसकी लम्बाई लगभग 100 किमी.है
विशेष –
इस नदी का बहाव क्षेत्र तौहरावाटी कहलाता है
इस नदी पर गणेश्वर सभ्यता (नीम का थाना-सीकर) विकसित हुई ।
गणेश्वर सभ्यता को ताम्र युगीन सभ्यता की जननी कहा जाता है ।
इस नदी पर झुंझुनू मे सुनारी सभ्यता विकसित हुई ।

सागरमती नदी –
उद्गम – अजमेर के बिसला तालाब से होता है ।
भांवता तथा पीसांगन मे बहती हुई Govindgarh नामक स्थान पर विलुप्त हो जाती है ।

रुपनगढ़ नदी –
उद्गम- अजमेर के कुचिल नामक स्थान से होता है ।
अजमेर मे बहती हुई सांभर झील मे जल गिराती है!
विशेष- अजमेर मे इस नदी पर निम्बार्क सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ सलेमाबाद स्थित है ।

साबी नदी –
उद्गम- जयपुर की सेवर पहाड़ियों से होता है
यह जयपुर में सेवर पहाड़ियों से निकलकर अलवर जिले की बानसूर ,बहरोड, किशनगढ़ बास ,मंडावर व तिजारा तहसील में बहने के बाद हरियाणा में गुड़गांव जिले में कुछ दूर तक प्रवाहित होकर पटौदी निकट उतरी भाग नफजगढ़ झील में समाप्त हो जाती है
यह अलवर जिले की सबसे बड़ी नदी है
मेन्था नदी
उद्गम- जयपुर के मनोहरपुरा थाना से होता है
जयपुर में बहने के पश्चात नागौर में बहती हुई सांभर झील में जल गिराती है
विशेष –
नागौर में इस नदी पर लूणवा जैन तीर्थ स्थित है!
स्थानीय भाषा मे इसे मसुरदी नदी कहा जाता है ।

जिलानुसार राजस्थान की नदियां :-
1) Ajmer – साबरमती, सरस्वती, खारी, ड़ाई, बनास
2) Alwar – साबी, रुपाढेल, काली, गौरी, सोटा
3) Banswara – माही, अन्नास, चैणी
4) Barmer – लूनी, सूंकड़ी
5) Bharatpur – चम्बल, बराह, बाणगंगा, गंभीरी, पार्वती
6) Bhilwara – बनास, कोठारी, बेडच, मेनाली, मानसी, खारी
7) Bikaner – कोई नदी नही
8) Bundi – कुराल
9) Churu- कोई नदी नही
10) Dholpur – चंबल
11) Dungarpur – सोम, माही, सोनी
12) Shri Ganga Nagar – धग्धर
13) Jaipur – बाणगंगा, बांड़ी, ढूंढ, मोरेल, साबी, सोटा, डाई, सखा, मासी
14) Jaisalmer – काकनेय, चांघण, लाठी, धऊआ, धोगड़ी
15) Jalore – लूनी, बांड़ी, जवाई, सूकड़ी
16) Jhalawar – काली सिन्ध, पर्वती, छौटी काली सिंध, निवाज
17) Jhunjhunu – काटली
18) Jodhpur – लूनी, माठड़ी, जोजरी
19) Kota – चम्बल, काली सिंध, पार्वती, आऊ निवाज, परवन
20) Nagaur – लूनी
21) Pali – लीलड़ी, बांडी, सूकड़ी जवाई
22) Sawai madhopur – चंबल, बनास, मोरेल
23) Sikar- काटली, मन्था, पावटा, कावंट
24) Sirohi- प. बनास, सूकड़ी, पोसालिया, खाती, किशनावती, झूला, सुरवटा
25) Tonk – बनास, मासी, बांडी
26) Udaipur – बनास, बेडच, बाकल, सोम, जाखम, साबरमती
27) Chittorgarh – वनास, बेडच, बामणी, बागली, बागन, औराई, गंभीरी, सीवान, जाखम, माही।

राजस्थान की मिट्टी से संबंधित कुछ तथ्य :-
जिस मृदा का ph मान परिसर 6.5-7.5 होता है यह मृदा सामान्य मृदा कहलाती है इसमें पादप पोषक सुलभता एवं सूक्ष्मजीव क्रियाशीलता अधिक होती है
जिस मिट्टी में चूने की मात्रा कम होती है उसे अम्लीय मिट्टी कहते हैं अम्लीय मिट्टी (Acidic soil) का पीएच मान 7से कम होता है अम्लीय मिट्टियों कोें चूना पत्थर गंधक का अम्ल पायराइट्स (pyrites) आदि रसायनों का उपयोग कर के सुधारा जा सकता है
लवणीय मिट्टियों ( Saline soils) में चुकंदर आलू कपास जौ गेंहू जैसी लवण रोधी फसल उगाना लाभदायक रहता है
राज्य का सर्वाधिक 19.41 प्रतिशत भूभाग वायु अपरदन से ग्रस्त है
राजस्व की दृष्टि से सिंचित भूमि को चाही और असिंचित भूमि को बारानी कहते हैं
वर्ष 1952 में जोधपुर में मरुस्थल वृक्षारोपण एवं अनुसंधान केंद्र ( Research centre)खोला गया था
हनुमानगढ़ जिले का बडोपल गांव सेम की समस्या के लिए जाना जाता है
किन्ही कारणों से रेगिस्तान का आगे बढ़ना रेगिस्तान का मार्च कहलाता है

राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्र के उपनाम :-
1) भोराठ/भोराट का पठार
यह Udaipur जिले के कुम्भलगढ ओर गोगुन्दा के मध्य का पठारी क्षेत्र का भाग है।
2) लासङिया का पठार
यह उदयपुर जिले में जयसमंद (Jaisamand) से आगे कटा-फटा पठारी क्षेत्र का भाग है।
3) गिरवा
यह उदयपुर जिले के चारों ओर पहाडि़यों के कारण उदयपुर की आकृति एक तश्तरीनुमा बेसिन जैसी है जिसे स्थानीय भाषा में गिरवा कहा जाता है |

राजस्थान वन्य जीवों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य :- 
सन् 1972 में वन्य जीवों के संरक्षण के लिए अधिनियम बनाया गया, जिसकें अन्तर्गत राजस्थान में 33 आखेट निषिद्ध क्षेत घोषित किए गए।
सन् 2004 में Wild animals की सुरक्षा के लिए नेचर गाई पॉलिसी बनाई गई, जिसे 2006 में जारी किया गया था।
राजस्थान में पहला वन्यजीव संरक्षण अधिनिमय( Wildlife Protection Act) , 1950 बनाया गया।
वर्तमान में 1972 का अधिनियम लागू हैं।
1972 का अधिनियम राजस्थान में सन् 1973 में लागू हुआ।
उत्तर भारत का पहला सर्प उद्यान (Garden snake) कोटा में स्थापित हैं।
डॉक्टर सलीम अली पक्षी विशेषज्ञ हैं।
सलीम अली इन्टरप्रिटेशन सेंटर केवलादेव अभयारण्य में स्थापित हैं।
राजस्थान में लुप्त होने वाले जीवों में पहला स्थान गोड़ावन का, डॉल्फिन मछली का, बाघों का हैं।
सर्वांधिक लुप्त होने वाली जीवों का उल्लेख Red data book में, संभावना वाले येलो बुल में में उल्लेखित किये जाते हैं।
कैलाश सांखला टाईगर मैन ऑफ इण्डिया जोधुपर के थे।
पुस्तक:- रिर्टन ऑफ द टाईगर, टाईगर
बाघ परियोजना ( Tiger project) कैलाष सांखला ने बनाई थी।
वन्य जीव सीमार्ती सूची 42 के अंतर्गत आते हैं।
सन् 1976 के संशोधन के द्वारा इसे सीमावर्ती सूची में डाला गया हैं।
राजस्थान में जोधपुर पहली रियासत थी जिसने वन्य जीवों को बचान के लिए कानून बनाया।
पहला टाईगर सफारी पार्क रणथम्भौर अभयारण्य (Ranthambore Sanctuary) में स्थापित किया गया था।
वन्य जीवों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का दूसरा स्थान हैं।
सर्वांधिक वन्यजीव असम में हैं।
बीकानेर, जैसलमेर व बाड़मेर में गोड़ावन पक्षी सर्वांधिक पाये जातें हैं। सबसे अधिक जैसलमेर में पाये जाते हैं।
सर्वांधिक कृष्ण मृग डोलीधोवा (जोधपुर व बाड़मेर ) में पाये जाते हैं।

राजस्थान पशुधन :-
निःशुल्क दवा योजना – 15 अगस्त 2012 से प्रारंभ – उद्देश्य: राज्य के 5.67 करोड़ पशुधन (1.21 करोड़ गाएं, 1.11 करोड़ भैंसें, 2.15 करोड़ बकरियां, 1.11 करोड़ भेड़ें, 4.22 लाख ऊंट आदि) हेतु 110 आवश्यक औषधियों (पहले 87) व 13 सर्जिकल मेटेरियल ( Surgical Material) की निःशुल्क उपलब्धता सुनिश्चित करना।
राजस्थान दुग्ध उत्पादक संबल योजना – राज्य सरकार के सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों में दूध की आपूर्ति करने वाले पशुपालकों को राज्य सरकार द्वारा 2 रू. प्रति लीटर की दर सं अनुदान उपलब्ध करवाना।

राजस्थान की सिचाई परियोजनाऐं :-
परिभाषा –
वर्षा के अभाव में भूमि को कृत्रिम तरीके से जल पीलाने की क्रिया को सिंचाई करना कहा जाता है। सिंचाई आधारभूत संरचना का अंग है। योजनाबद्ध विकास के 60 वर्षो के बाद भी राजस्थान आधारभूत संरचना की दृष्टि से भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले पिछड़ा हुआ है। राज्य में कृषि योग्य भूमि का 2/3 भाग वर्षा पर निर्भर करता है।
शुष्क खेती –
वर्षा आधारित क्षेत्रों में भूमि की नमी को संरक्षित रखकर की जाने वाली खेती को शुष्क खेती कहते हैं। भारत में नहरों की कुल लम्बाई विश्व में सबसे अधिक है। सिंचित क्षेत्र भी सबसे अधिक है। परन्तु हमारी आवश्यकताओं से कम है।
राजस्थान के कुल सिचित क्षेत्र का सबसे अधिक भाग श्री गंगानगर एवं सबसे कम भाग राजसमंद जिले में मिलता है। कुल कृषि क्षेत्र के सर्वाधिक भाग पर सिंचाई श्रीगंगानगर जिले में तथा सबसे कम चूरू जिले में मिलता है। राजस्थान कृषि प्रधान राज्य है। यहां के अधिकांश लोग जीवन – स्तर के लिए कृषि पर निर्भर है। कृषि विकास सिंचाई पर निर्भर करता है। राजस्थान के पश्चिमी भाग में मरूस्थल है। मानसून की अनिश्चितता के कारण ‘ कृषि मानसून का जुआ‘ जैसी बात कई बार चरितार्थ होती है।

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राजस्थान का बोली-भूगोल :-
राजस्थान के बोली-भूगोल का सर्वेक्षण राजस्थानी संपूर्ण राजस्थान तथा वर्तमान मध्य-प्रदेश के अंतर्गत स्थित सांस्कृतिक इकाई मालवा की भाषा मानी जाती है। इसके बोलने वालों की संख्या लगभग ग्यारह करोड़ है। भाषाविदों ने राजस्थानी को हिंदी से पृथक भाषा स्वीकार किया है, किंतु इतिहासकारों एवं साहित्यकारों के मध्य वह हिंदी की ही एक उपभाषा मानी जाती है। राजस्थानी किसी एक स्थान-विशेष में बोली जाने वाली भाषा नहीं है, अपितु राजस्थान और मालवा में प्रचलित बोलियों (यथा- मारवाड़ी, ढूँढाड़ी, हाड़ोती, मेवाती, निमाड़ी, मालवी आदि) का सामूहिकता सूचक नाम है। उक्त बोलियों के सर्व-समावेशी (Over-all-form) के रूप में साहित्य में प्रतिष्ठित है जिसका विकास एक सुदीर्घ एवं सुस्पष्ट साहित्यिक परम्परा पर आधारित है। इस साहित्यिक स्वरूप में क्षेत्रीय विशेषताएँ भी अनायास ही समाहित हो गयी हैं। यह सर्व-समावेशी रूप समस्त राजस्थान और मालवा में पारस्परिक विचार-विनिमयता की दृष्टि से बोधगम्य है और इसीलिए आधुनिक साहित्य (साहित्यिक विधाओं एवं पत्र-पत्रिकाओं) में इसका व्यवहार होता है। राजस्थान में जितनी भी क्षेत्रीय बोलियाँ हैं, उनमें भाषातात्विक दृष्टि से इतना कम अंतर है

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