पादप रोग

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पादप रोग

पादप रोग :-
पादप रोगविज्ञान या फायटोपैथोलोजी (plant pathology या phytopathology) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक के तीन शब्दों जैसे पादप, रोग व ज्ञान से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “पादप रोगों का ज्ञान (अध्ययन) अत: पादप रोगविज्ञान, कृषि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान या जीव विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत रोगों के लक्ष्णों, कारणों, हेतु की, रोगचक्र, रागों से हानि एवं उनके नियंत्रण का अध्ययन किया जाता हैं।
पादप रोगविज्ञान या फायटोपैथोलोजी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक के तीन शब्दों जैसे पादप, रोग व ज्ञान से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है “पादप रोगों का ज्ञान (अध्ययन)”। अत: पादप रोगविज्ञान, कृषि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान या जीव विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत रोगों के लक्ष्णों, कारणों, हेतु की, रोगचक्र, रागों से हानि एवं उनके नियंत्रण का अध्ययन किया जाता हैं।

उद्देश्य :-
इस विज्ञान के निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य है –
1) पादप-रोगों के संबंधित जीवित, अजीवित एवं पर्यावरणीय कारणों का अध्ययन करना
2) रोगजनकों द्वारा रोग विकास की अभिक्रिया का अध्ययन करना
3) पौधों एवं रोगजनकों के मध्य में हुई पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन करना
4) रोगों की नियंत्रण विधियों को विकसित करना जिससे पौधों में उनके द्वारा होने वाली हानि न हो या कम किया जा सके।

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परमाणु संरचना

धान के रोग :-
रोगों का विस्तार तापमान एवं अन्य जलवायु सम्बंधी कारको पर निर्भर करता है तथा साथ ही सस्य-क्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है। धान के मुख्य रोगों को उनके कारकों के आधार पर तीन भागों में बाँटा जाता है –
कवकीय रोग (Fungal)- कवक के कारण उत्पन्न रोग
1) बदरा
2) तनागलन
3) तलगलन एवं बकाने
4) पर्णच्छद गलन
5) पर्णच्छद अंगमारी
6) भूरी-चित्ती
7) जीवाणुज़ रोग (Bacterial) – जीवाणुओं के कारण उत्पन्न रोग
8) जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी
9) जीवाणुज़ पत्ती रेखा वाइरस रोग (Virus) – वाइरस के कारण उत्पन्न रोग
टुंग्रो
10) कवकीय रोग (Fungal)- कवक के कारण उत्पन्न रोग

1) बदरा –
कारक जीव पिरीकुलेरिया ग्रीस्या :-
लक्षण – यह रोग फफूंद से फैलता है। पौधे के सभी भाग इस बीमारी द्वारा प्रभावित होते है। प्रारम्भिक अवस्था में यह रोग पत्तियों पर धब्बे के रूप में दिखाई देता है। इनके धब्बों के किनारे कत्थई रंग के तथा बीच वाला भाग राख के रंग का होता है। रोग के तेजी से आक्रमण होने पर बाली का आधार से मुड़कर लटक जाना। फलतः दाने का भराव भी पूरा नहीं हो पाता है।
नियंत्रण – उपचारित बीज ही बोयें, जुलाईके प्रथम पखवाड़े में रोपाई पूरी कर लें। देर से रोपाई करने पर झुलसा रोग के लगने की संभावना बढ़ जाती है फसल स्वच्छता, सिंचाई की नालियाँ घास रहित होना, फसल -चक्र, प्रथम फसल के अवशेषों को जलाना उपाय अपनाना । खेत में 5+2 सें.मी. पानी रखें । रोग प्रकोप के समय खेत को सूखा न रखें । संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें, नाइट्रोजन को तीन बार दें । क्षेत्र हेतु संस्तुत रोग रोधी किस्म का प्रमाणित बीज प्रयोग करें । फसल पर रोग के लक्षण प्रकट होने पर 0.1 प्रतिशत हिनोसान अथवा 0.1 प्रतिशत बावस्टीन अथवा 0.06 प्रतिशत बीम का छिड़काव करें ।

2) तनागलन :-
लक्षण : इस रोग का मुख्य लक्षण भूरे काले रंग के धब्बों के रूप में रोपाई के 2-3 सप्ताह बाद तना तथा पर्णच्छद पर पानी की सतह के पास दिखने लगता है, जो कई सें.मी. तक ऊपर-नीचे फैल जाता है । रोगी पौधे के तने को चीरने पर कपासी-सलेटी रंग के कवक जाल में काले-काले स्कलेरोशियम पाए जाते हैं । जिन खेतों में पानी देर तक ठहरता हो, उनमें पर्णच्छद पर लकीरों में छोटे-छोटे काले पेरीथोसियम बनते हैं । तना सड़ जाता है, जो खींचने पर आसानी से टूट कर उखड़ जाता है । नीचे से २-३ गाठों पर या पानी से ऊपर आपस्थानिक जड़े भी निकलती हैं । तनागलन से रोग ग्रसित पौधे आसानी से गिर जाते हैं ।
नियंत्रण – कार्बेडांज़िम अथवा थायोफेनेटमिथायिल के 0.1 प्रतिशत घोल का 2 बार अर्थात रोग लक्षण प्रकट होने के आरंम्भ तथा पुष्पन के समय फसल पर छिड़काव करने से रोग नियंत्रण में आ जाता है । नाइट्रोजन उर्वरक के साथ पोटाश उर्वरक देने से रोग-संक्रमण कम पाया गया है

3) तलगलन एवं बकाने :-
कारक – जिबरेला फयूजीकुरेई
लक्षण – रोपाई के बाद खेत में भी पौधे ऐसे ही पीले, पतले तथा लम्बे हो जाते हैं । रोगी पौधों की सभी दौजियां पीली हरी सी ही निकलती है। अधिकतर पौधे पुष्प गुच्छ निकलने एवं पकने से पहले ही मर जाते है। रोगी पौधों के निचले भागों पर बने कोनिडिया हवा द्वारा स्वस्थ पौधों के पुष्प पहुंचकर फूलों पर संक्रमण करते हैं तथा रोगग्रस्त दाने बनते है, जो अंकुरण बाद रोग के लक्षण प्रकट करते हैं । में इसी प्रकार के पतले लम्बे पौधे तथा मारता हुआ पौधादर्शाया गया है । उच्च भूमि में धान के पौधों का बिना लम्बा हुए ही तलगलन/ पदगलन के लक्षण पाए गये है । दौजियाँ निकलने या बालियां आने के बाद नमी युक्त वातावरण में तने के निचले भागों पर सफेद से गुलाबी रंग का कवक दिखाई देता है, जो क्रमशः ऊपर की ओर बढ़ता है । मौसम के अन्त में निचले पर्णच्छद का रंग नीला और बाद में काला हो जाता है, जिन पर छोटे-छोटे काले बिखरे हुए पेरीथीसियम बनते है ।
नियंत्रण – बावस्टीन द्वारा बीज उपचार (0.1 प्रतिशत घोल में 36 घंटे बीज भिगोने) को बकाने के नियंत्रण के लिए अत्याधिक प्रभावकारी(81.3 प्रतिशत नियंत्रण) पाया, इन्होंने तरावडी बासमती किस्म पर उपलब्ध सात कवकनाशियों को परखा था, जिनमें उक्त उपचार सर्वोत्तम पाया गया0.1%सेरेसान के घोल में 48 घंटे तथा इसके 0.2% घोल में 36 घंटे बीज भिगोने पर तलगलन रोग का पूर्ण नियंत्रण पाया । रोगग्रस्तक्षेत्रों में

4) पर्णच्छद गलन :-
कारक जीव – एक्रो सिलीड्रयम ओराइजी
लक्षण – नयी बालियों को बनने से रोकता है भूरे धब्बे भी पर्णच्छद तथा कल्लो पर पाए जाते है शुरुआत में धब्बे अनियमित 0.5-1.5 सेमी लम्बे किनारे पर भूरे जो की बाद में बड़े तथा पुरे पर्णच्छद पर फ़ैल जताए है. जब ऊपर के पर्णच्छद इससे पूर्णत प्रभावित हो जाते है तब बालिया या तो निकलती नहीं है यदि निकलती है तो दाने नहीं बनते है |
नियंत्रण – प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करे जैसे तणुकन , रामतुलसी, मंसूरी विष्णुभोग तथा कालानमक इत्यादि | नत्रजन का प्रयोग तिन बार करना चाहिए इसके अलावा पोटैसियम का प्रयोग दो बार करना चाहिए | बेनलेट द्वारा बीज उपचार करना चाहिए | कवकनासी बेनलेट तथा डेकोनिल की 0.2 % मात्रा का 10 दिन के अंतर पर छिडकाव करे.

5) पर्णच्छद अंगमारी :-
कारक जीव – राइजोक्टोनिया सोलेनी
लक्षण पानी अथवा भूमि की सतह के पास पर्णच्छ पर रोग के प्रमुख लक्षण प्रकट होते है । पर्णच्छद पर 2 या 3 सें.मी.लम्बे हरे भूरे क्षतस्थल बनते हैं, जो बाद में पुआल के रंग के हो जाते हैं । यह धब्बा भूरी या बैंगनी भूरी पतली पट्टी से घिरा रहता है । बाद में ये क्षतस्थल बढ़कर तने को चारो ओर से घेर लेता है । अधिक एवं लम्बी अवधि तक ओंस गिरना भी इस रोग के विस्तार में सहायक है ।
नियंत्रण सस्य क्रियाओं को उचित समय पर सम्पन्न करना तथा पिछली फसलों के अवशेषों को जलाना । आवश्यकता अनुसार नाइट्रोजन उर्वरकों का उपयोग और रोग प्रकट होने पर टाप-डैसिंग को कुछ समय हेतु स्थागित करना । घास कुल के खरपतवारों एवं निकट जलकुंभी को नष्ट करना । पुष्पगुच्छ प्रारम्भिक अवस्था से फूल आने तक 10 प्रतिशत दौजी पर लक्षण दीखते ही 0.1 प्रतिशत बावस्टीन का पर्णीय छिड़काव करना । खरपतवारनाशी प्रोपेनिल (Propanil) के उपयोग से भी पर्याप्त सहायता मिलती है, क्योंकि इससे फसल में खरपतवार विनिष्ट होते हैं और कवक-संक्रमण से फसल बचती है ।

6) भूरी चित्ती रोग :-
कारक – हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराईज़ी
लक्षण चोल (Coleoptile), पत्तियों, पर्णच्छद तथा तूष(Glumes) पर पाए जाते हैं । धब्बा, छोट ,भूरातथा गोलाई लिए होता है ।यह बहुत छोटी बिंदी से लेकर गोल आंख के आकार का गाढ़ा भूरा या बैंगनी भूरा होता है परन्तु बीच का भाग पीलापन लिए गंदा सफेद धूसररंग का होता है । धब्बे आपस में मिलाकर बड़े हो जाते हैं तथा पत्तियों कोसुखा देते हैं । उग्र सक्रमण में बालियाँ बाहर नहीं निकल पाती ।
नियंत्रण – बीजों को थीरम एवं कार्बेन्डाजिम की उग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए। रोग सहनशी किस्मों जैसे- बाला, कृष्णा, कुसुमा, कावेरी, रासी, जगन्नाथ और आई आर 36, 42, आदि का व्यवहार करें। रोग दिखाई देने पर मैन्कोजैव के 0.25 प्रतिशत घोल के 2-3 छिड़काव 10-12 दिनों के अन्तराल पर करना चाहिए। अनुशंसित नेत्रजन की मात्रा ही खेत मे डाले। बीज को बेविस्टीन 2 ग्राम या कैप्टान 2.5 ग्राम नामक दवा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से बुआई से पहले उपचारित कर लेना चाहिए। खड़ी फसल में इण्डोफिल एम-45 की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 1000 लीटर पानी मे घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव 15 दिनों के अन्तर पर करें। रोगी पौधों के अवशेषों और घासों को नष्ट कर दें।
मिट्टी मे पोटाश, फास्फोरस, मैगनीज और चूने का व्यवहार उचित मात्रा मे करना चाहिए।
जीवाणुज़ रोग (Bacterial) – जीवाणुओं के कारण उत्पन्न रोग

1) जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी कारक :-
जैन्थोमोनास ओराइज़ी –
लक्षण – जिसमें पीले या पुआल के रंग के लहरदार क्षतिग्रस्त स्थल पत्तियों के एक या दोनों किनारों के सिरे से प्रारम्भ होकर नीचे की ओर बढ़ते हैं और अन्त में पत्तियाँ सूख जाती हैं । गहन संक्रमण की स्थिति में रोग पौधों के सभी अंगों जैसे पर्णाच्छद, तना एवं दौजी को सूखा देता है । क्रेसक अवस्था में पौधों में संक्रमण पौदशाला से ही अथवा पौद लगाने के तुरन्त बाद प्रारम्भ से ही सर्वागीं हो जाता है । तना चीरने पर जीवाणुज़ से द्रव मिलता है । पश्चात् पत्तियाँ लिपटकर नीचे की ओर झुक जाती हैं । रोग की उग्र स्थिति में पौधे मर जाते हैं । जस्ता देने से इस रोग की क्रेसक अवस्था में कमी होती है ।
नियंत्रण – रोग रोधी किस्म का चुनाव रोग नियंत्रण का सर्वोत्तम उपाय है संतुलित उर्वरकों का उपयोग करें तथा समय-समय पर पानी निकालते रहें ।
रोग के लक्षण प्रकट होने पर 75 ग्राम एग्रीमाइसीन-100 और 500 ग्राम ब्लाइटाक्स का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टर छिड़काव करें, 11 से 12 दिन के अंतर पर आवश्यकतानुसार दूसरा एवं तीसरा छिड़काव करें ।

2) जीवाणुज़ पत्ती रेखा (Bacterial Leaf Streak)
कारक जैन्थोमोनास ओराइज़ी पीवी. ओराइज़िकोला
लक्षण – पत्तियों के अंतरा शिरा भाग में सूची शीर्ष के समान सूक्ष्म पानी भीगा पर भासक स्थान स्पष्ट होता है । ये धारियां शिराओं से घिरी रहती हैं और पीली या नारंगी कत्थई रंग की हो जाती हैं । मोती की तरह छोटे-छोटे पीले से गंदे सफेद रंग के जीवाणुज़ पदार्थ धारियों पर पाए जाते हैं, जो पत्तियों की दोनों सतहों पर होते हैं । कई धरियां आपस में मिलकर बड़े धब्बों का रूप ले लेती हैं, जिससे पत्तियाँ समय से पूर्व सूख जाती हैं । पर्णच्छद भी संक्रमित होता है, जिस पर पत्तियों के समान ही लक्षण प्रकट होते हैं ।
नियंत्रण – बीज प्रमाणित स्रोत से लिया जाय । क्षेत्र के अनुसार रोग रोधी किस्मों का चुनाव करें । बीज को 2.5 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या 3 ग्राम एग्रीमाइसीन-100 का 10 लीटर पानी के घोल में 12 घन्टे भिगोएं या 50 से. गर्म पानी में 30 मिनट रखकर उपचारित करें । रोग लक्षण प्रकट होने पर 12 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या 75 ग्रा. एग्रीमाइसीन 100 प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें । आवश्यक हो तो 10 से 12 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें ।

धान के रोग एवं उनसे बचाव :-
प्रकृति पृथ्वी पर सैदव ही जैव-संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती है, परन्तु मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इस संतुलन को प्रायः नष्ट करने पर उद्यत दिखाई देता है । पिछले तीन दशकों में बढ़ती जनसंख्या की उदर-पूर्ति के लिए खाद्यान्न उत्पादन के नये आयाम बनाए गये । धान फसल का इसमें सार्थक आयाम बनाए गये । धान फसल का इसमें सार्थक योगदान रहा । उन्नत बौनी किस्मों को उच्च निवेश-स्तर के साथ उगाने से जहाँ अधिक उत्पादन प्राप्त हुआ, वहीं कीट-व्याधियों को भी अनुकूल वातावरण मिला, इस कारण वर्तमान में धान-उत्पादकों को इन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है । इन व्याधियों के कारण जितनी अधिक उपज में गिरावट होती है, उतना ही इनके नियंत्रण की ओर ध्यान देना आवश्यक हो गया है ।
नाइट्रोजन की अधिक मात्रा उपयोग करने से धान पर जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी, तनागलन, बदरा एवं आभारी कांगियारी आदि रोगों का प्रकोप बढ़ता है । उत्तरी-पश्चिमी भारत में पाया गया कि 15 जुलाई से पहले की रोपाई में बदरा एवं बंट का प्रकोप कम होता है, जबकि देर से रोपाई करने पर आभासी कांगियारी का संक्रमण घटता है । यही नहीं किस्मों में भी रोग-रोधिता स्तर में भिन्नता है । हरियाणा कृषि विश्विद्यालय के कौल केन्द्र पर विभिन्न बासमती किस्मों में बदरा का प्रकोप 17 से 51.4 प्रतिशत अनुमानित किया गया । चंद आदि ने धान की किस्मों में बहु-रोग-रोधिता के महत्व की ओर ध्यान आकर्षित कराया, क्योंकि रोग-रोधी किस्मों की उपलब्धता से रासायनिक नियंत्रण की आवश्यकता न होगी और साथ ही वातावरण दूषित होने से बचेगा । जैव- नियंत्रण हेतु सुडोमोनास (Pseudomonas spp.) की ४ प्रथक (Isolates) हैदराबाद, मारूटेरू तथा चिपलिमा पर परखे गये, परन्तु पर्णच्छद अंगमारी के नियंत्रण में इनसे सफलता प्राप्त नहीं हुई
पिछले 2-3 दशकों में पौध-संरक्षण पर विशेष दिया गया । ऐसा अनुभव किया गया, कि केवल कवकनाशियों का प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है, परन्तु वातावरण -प्रदूषण से बचने हेतु ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना, जिससे पौधों पर इन कवक, जीवाणु एवं वाइरस का संक्रमण न हो अथवा कम हो । दूसरे शब्दो में कहा जा सकता है कि ये भी वातावरण में रहें, परन्तु धान की फसल को इतनी हानि न बहुचाएँ कि उपज में कहा जा सकता है कि ये भी वातावरण में रहें, परन्तु धान की फसल को इतनी हानि न पहुचाएँ कि उपज में अधिक गिरावट हो तथा अर्थिक लाभ पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।
रोगों का विस्तार तापमान एवं अन्य जलवायु संम्बधी संम्बधी कारको पर निर्भर करता है, साथ ही सस्य-क्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है । धान के मुख्य रोगों को उनके अभिकर्ता के आधार पर तीन भागों में बाटा जाता है ।
1) कवकीय (Fungal)
2) बदरा (Blast)
3) तनागलन (Stem rot)
4) तलगलन एवं बकाने (Foot rot & bakanae)
5) पर्णच्छद गलन (Sheath rot)
6) पर्णच्छद अंगमारी (Sheath blight)
7) भूरी-चित्ती (Brown spot)
8) आभासी कांगियारी (False smut)
9) उदबत्ता (Udbatta)
10) जीवाणुज़ (Bacterial)

जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी (Bacterial leaf blight)
जीवाणुज़ पत्ती रेखा (Bacterial leaf streak)
वाइरस (Virus)
टुंग्रो (Tungro)
घासीय-वृद्धि रोग (Grassy stunt)
रोगों के लक्षण पौधों की पत्तियों, पर्णच्छद, पुष्पगुच्छ तथा दानों पर पाए जाते हैं । कुछ को पत्तियों पर पाई जाने वाली विक्षति (Lesion) से पहचाना जा सकता है । चित्र-७१ में इस प्रकार की विक्षति दर्शायी गयी है (आऊ, १९७३) । प्रायः जीवाणु ग्रसित छोटे पौधे झुलसकर मरते है अथवा पत्तियों के किनारों पर विक्षति होती है, जबकि वाइरस ग्रसित पौधे की अवरूद्ध बढ़वार तथा दौजियों की अधिकता एवं पत्तियों के रंग में बदलाव होता है । चक्रवर्ती (१९७८) ने धान के रोगों को पौधो के विभन्न भागों पर संक्रमणता के आधार पर वर्गीकृत किया, जिससे फसल की उन विशेष अवस्थाओं पर ध्यान रखने से रोग प्रबंध अधिक प्रभावशाली हो सकेगा ।
वर्गीकरण निम्न प्रकार हैः

पौद की अवस्था (Seedling stage) :-
बदरा, भूरे धब्बे तलगलन एवं बकाने और जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी ।

पर्णच्छद एवं तने पर :-
बदरा, तनागलन, पर्णच्छद अंगमारी, तलगलन और पर्णच्छद गलन ।

पत्तियाँ (Foliage) :-
बदरा, भूरा धब्बे (भूरी चित्ती), संर्कीण पत्ती चित्ती, जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी, जीवाणुज़ पत्ती रेखा और टुग्रों ।
दाने पर
बदरा, भूरे धब्बे, बंट (Bunt), आभासी कांगियारी और उदबत्ता ।
धान के सघन क्षेत्रों में कुछ प्रतिवर्ष संक्रमण करते हैं तथा कभी-कभी ये उग्र रूप धारण कर लेते हैं, जिससे उपज में महत्वपूर्ण गिरावट होती है । अतः इन क्षेत्रों में रोग विशेष पर अधिक सर्तकता की आवश्यकता है, ऐसे क्षेत्रीय भाग निम्न हैः
बदरा – कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं प. बंगाल का पहाड़ी क्षेत्र, असम और मेघालय, बिहार के रांची, पलामू एवं छोटा नागपुर कोरापुर (उड़ीसा), आन्ध्र प्रदेश की आराकू घाटी, कोर्ग (कर्नाटक), रत्नागिरी (महाराष्ट्र), मध्य प्रदेश के बस्तर और सरगुजा के भाग एवं व्यानन्द और कुट्टांनद (केरल) ।
भूरी चित्ती उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र, मध्य प्रदेश, प.बंगाल, असम, एवं तमिलनाडु के कुछ भाग, कर्नाटक एवं केरल के तटीय क्षेत्र ।
तनागलन – पंजाब, हरियाणा एवं तमिलनाडु ।
उदबत्ता – उड़ीसा का पहाड़ी क्षेत्र कोरापुर, महाराष्ट्र का कोंकण और आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक

रोग नियत्रंण के सिद्धांत :-
रोग नियत्रंण से पूर्व उसकी प्रकृति, जीवन चक्र, संक्रमण की अवस्था तथा परपोषी पौधों की जानकारी आवश्यक है । इस ओर वैज्ञानिक लगातार प्रयत्नशील हैं, साथ ही सस्ते एवं प्रभावकारी रसायनों की खोज जारी है । आधुनिक विचार धारा के अनुसार फसल का पर्यावरण ऐसा हो जिसमें कवक, जीवाणु एवं वाइरस हानि न पहुंच सके । इसमें रोग रोधी किस्मों का विकास, परोक्ष में रोग विकास एवं वृद्धि के प्रतिकूल सस्यक्रियाएं अपनाना और सीधे रसायन (कवकनाशी) का रोग पर प्रहार सम्मलित हैं । सामान्यतः रोग ग्रसित फसल को बचाते-बचाते ही किसी कारण से देरी हो जाती है, जिससे फसल की उपज में काफी कमी आ जाती है । अतः रोग पैदा न होने देना ही नियंत्रण का सही उपाय है ।
रोग नियंत्रण विधियों को मुख्य रूप से ४ भागो में वर्गीकृत किया जा सकता है ।
1) अपवर्जन (Exclusion)
2) उन्मूलन (Eradication)
3) संरक्षण (Protection)
4) प्रतिरक्षीकरण (Immunization)

अपवर्जन :-
बिना रोक टोक के खाद्यान्नों एवं खाद्य पदार्थों का अंतर्राष्ट्रीय एवं अन्तर्राज्य स्तर पर आवागमन से काफी रोगों के प्रसारण में वृद्धि हुई है । इस प्रकार रोगग्रस्त क्षेत्रों से पौधे / वस्तुओं के आने को रोका जा सकता है, जिससे इनके विस्तार क्षेत्र में वृद्धि न हो । सभी देशों में संगरोध व्यवस्था (Quaantine Arrangements) की गई है, इसका पालन सबके हित में है । समय-समय पर इसके लिए विशेष कानून भी बनाए जाते रहें हैं । भारतवर्ष में १९१४ में संगरोध व्यवस्था लागू की गई तथा बाद में आवश्यकता अनुसार संशोधन होते रहे । विश्व में लगभग १५० देश इसका पालन करते हैं । रोग विस्तार के सभी माध्यमों जैसे भूमि, पानी एवं हवा के माध्यम से रोगकारी जीवाणु एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवेश न कर सकें, ऐसा प्रयास किया जाता है ।

उन्मूलन :-
कुछ परिस्थितियों में रोग ग्रसित पौधों का उन्मूलन ही आर्थिक दृष्टि से रोग नियंत्रण का लाभप्रद एवं आसान विधि होती है । इस विधि में ग्रसित क्षेत्र के पौधों या परपोषी फसल को ही नष्ट कर देना आर्थात काटकर जला देना अथवा मिट्टी में दबा देना होता है । फसल की अनुपस्थिति में ये रोगजनक अन्य खरपतवार इत्यादि के पौधे को अपना आश्रय बनाकर रहते है । अतः ऐसे पौधों (परपोषी) को काट कर नष्ट करने से भी इनका जीवन चक्र टूट जाएगा, जिससे नए संक्रमण को रोका जा सकता है । बदरा रोग सामान्यतः धान से पहले सावंक पर रहता है । अतः इन खरपतवारों को नष्ट करने से मूल निवेश द्रव्य की मात्रा में कमी होगी और धान की फसल में होने वाले बदरा रोग के प्रकोप की संभावनएं भी उसी अनुपात में कम होगी । इस प्रकार का प्रबंध भी उन्मूलन कहलाता है ।
फसल-चक्र अपनाने से भी इन रोगजनक जीवधारियों का जीवन चक्र टूटता है तथा रोग की सघनता में सार्थक कमी होती है, क्योंकि प्रत्येक रोग की अपनी विशेष परिस्थितिकी आवश्यकताएं होती है । इस प्रकार मृदा उत्पन्न रोग जीवधारियों पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है । खेत की सफाई एवं पहली फसल अवशेषों को नष्ट करना भी इसी ओर पहला कदम है । तनागलन ग्रसित फसल के अवशेषों को जलाना इसी विधि में आता है, इससे रोग संक्रमण घटेगा ।
बीजों को बिजाई से पूर्व पारायुक्त कवकनाशी (Organo Mercurial Fungicide) से उपचारित करने पर बीज जनित रोगों से फसल को मुक्त किया जा सकता है । एमीसान से बीजों का उपचार करने पर बकाने रोग के लक्षण प्रकट होने की संभावनाएं समाप्त हो जाती है अर्थात बीज द्वारा संक्रमण नहीं हो पाता तथा फसल रोग-मुक्त रहती है ।

संरक्षण :-
इस प्रकार के प्रबंध का उद्देश्य फसल को ऐसा वातावरण प्रदान करना है, जिससे रोगजनक पौधों पर संक्रमण न कर सकें । इसके लिए रसायनों का प्रयोग और पर्यावरणीय-चालक (Manipulation) जैसी व्यवस्था की जाती है जैसे हवा रोधकों आदि का उपयोग । कवकनाशी का प्रयोग भी दोनों के बीच ऐसा वातावरण पैदा करता है । अतः समय-समय पर विभिन्न कवकनाशियों के छिड़काव भुरकाव की आवश्यकता होती है, जिससे फसल को सुरक्षा प्राप्त होती रहती है । कवकनाशी वे रसायन है, जो कवक एवं जीवाणु द्वारा उत्पन्न रोगों के नियंत्रण हेतु प्रयोग किए जाते है । कुछ ही रसायन ऐसे हैं जो वाइरस संक्रमण से पौधों को संरक्षण देने में समर्थ हैं ।
रासायनिक पौध संरक्षक (कवकनाशी इत्यादि) भी सतह (Contact) एवं व्यवस्थित (Systematic) दोनों ही प्रकार से कार्य करते हैं । सतह संरक्षण में कवकनाशियों से बीज, पत्तियाँ एवं फल आदि को रोग से मुक्ति मिलती है, जबकि व्यवस्थित कवकनाशी परपोषी पौधे की शारीरिक क्रियाओं में प्रविष्ट होकर रोगजनकों (कवक एवं जीवाणु) के संक्रमण से पौधों की रक्षा करते है । इन कवकनाशियों को उनके रासायनिक गुणों के आधार पर भी जाना जाता है । मुख्यतः ये गंधक, तांबा, पारा, जैविक (Organic) तथा प्रति-जैविक (Antibiotic) आदि के ग्रुप में बाँटे जा सकता हैं ।

प्रतिरक्षीकरण (रोधन) :-
पौधों में इस प्रकार की आंतरिक प्रतिरक्षा शक्ति उत्पन्न करना जिससे रोगजनक उन पर संक्रमण न कर सके, रोग नियंत्रण की प्रतिरक्षी विधि कहलाती है । वातावरण में रोग बीजाणु होने पर भी फसल के पौधों को प्रभावित न कर सके अर्थात पौधों में रोग-रोधिता की शक्ति उत्पन्न करना ही इस सिद्धांत का मूलमंत्र है । रोग रोधी किस्मों का विकास, ऐसा ही एक कदम है । जैसे एच.के.आर. 120 किस्म पर जीवाणुज़ पत्ती अंगमारी का संक्रमण नहीं होता, जबकि पी.आर. 106 इस रोग से ग्रसित हो जाती है । ऐसी ही किस्म विक्रमार्या, जो टुग्रों वाइरस से प्रभावित नही होती । कलिता आदि ने आई.आर.50,पी.टी.बी. 18 एवं साकेत 4 किस्मों में एक अंक माप के साथ टुंग्रो वाइरस के प्रति -रोधिता पायी । इस प्रकार मुख्य बीमारियों के प्रति बहुत सी प्रतिरोधी किस्मों का विकास कर लिया गया है । इस प्रकार की रोग निरोधकता, रोग उत्पन्न होने से पूर्व कवकनाशियों के द्वारा बीजोपचार, पौद उपचार आदि से भी प्राप्त की जा सकती है ।रासायनिक उपचार संरक्षण विधि में भी कवकनाशियों का प्रयोग करते हैं, जिनका अनुभव के आधार पर रोग की संभावनाओं के समय पर कवकनाशी द्वारा पौधों का रोगों से बचाव करते हैं, परन्तु प्रतिरक्षक विधि में रोग आक्रमण से पूर्व किया गया उपचार ही आता है ।

General Science Ke Question Answer

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