इंदिरा गांधी नहर परियोजना

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इंदिरा गांधी नहर परियोजना

इंदिरा गाँधी नहर :- इंदिरा गाँधी नहर को राजस्थान नहर के नाम से भी जाना जाता है। यह राजस्थान के उत्तर-पश्चिम भाग में बहती है। राजस्थान की महत्वाकांक्षी इंदिरा गाँधी नहर परियोजना से मर्यस्थलीय क्षेत्र में चमत्कारिक बदलाव आ रहा है और इससे मरुभूमि में सिंचाई के साथ ही पेयजल और औद्योगिक कार्यों के लिए भी पानी मिलने लगा है। पहले इस नहर को ‘राजस्थान नहर’ के नाम से जाना जाता था। अब इसका नया नाम ‘इंदिरा गाँधी नहर’ है। इंदिरा गाँधी नहर के निर्माण से पूर्व लोगों को कई मील दूर से पीने का पानी लाना पडता था, लेकिन अब परियोजना के अंतर्गत 1200 क्यूसेक पानी केवल पेयजल उद्योग, सेना एवं ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आरक्षित किया गया है।

विश्व की सबसे बड़ी नहर :- विश्व की सबसे बड़ी 649 किलोमीटर लम्बी नहर ने राजस्थान के मरु प्रदेश में जिस हरित क्रांति को जन्म दिया, जिस औद्योगिक क्रांति से विकास किया और जिस समाजिक क्रांति से जन-चेतना को जाग्रत किया, उसका श्रेय इन्दिरा गाँधी नहर को है। यह वही विशाल नहर है, जो मरु गंगा के नाम से विख्यात है और जिसके कारण पर्यावरण में ऐसा सुधार हुआ है कि बालू के टीलों वाले प्रदेश के उस क्षेत्र का भूगोल ही बदल गया है। भूगोल बदलने से पश्चिमी राजस्थान के नए इतिहास की संरचना हो रही है। इस नहर की लम्बी जल-यात्रा सही अर्थों में जय यात्रा है |

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राजस्थान के लिए महत्त्व :- दुर्गम व कठोर मरुस्थल, असाधारण व असहनीय तापक्रम और विपरीत व भयानक भौगोलिक परिस्थितियों के बीच इस जल विहीन और निर्जन क्षेत्र में नहर का निर्माण कर हिमालय का हिम-जल पहुँचाना यथार्थ में प्रकृति के विरुद्ध एक साहसी कदम था। लेकिन राजस्थान ने इस चुनौती को स्वीकारा और कड़े परिश्रम से प्रकृति पर विजय प्राप्त की। इससे बालू के टीलों में नया कलरव आया है। हजारों श्रमिकों और इंजीनियरों ने अपने श्रम साहस लगन और कौशल से तीन दशक पूर्व सोचे गए सपने को साकार किया। रेत के टीलों से भरे क्षेत्र में वर्षा का अभाव और जल स्रोतों की कमी के कारण जहाँ लोग पानी-पानी को तरसते थे, वहाँ की अब काया पलट हो गई है और रेत के टीले हरे भरे खेतों में विकसित हो गए हैं। मरुस्थल की भयावहता की स्थिति में जिस प्रकार यह इन्दिरा गाँधी नहर एक नहर रूपी नदी के रूप में अवतरित हुई, उसका उदाहरण विश्व में अन्यत्र नहीं मिलता। पंजाब के हरे भरे क्षेत्र हरित बैराज से राजस्थान के सीमान्त क्षेत्र बाड़मेर ज़िले में गडरा रोड तक की नहर की कल्पना कैसे साकार हो रही है |

नहर की कल्पना :- इस विशाल नहर की कल्पना सबसे पहले 1948 में तत्कालीन बीकानेर राज्य के सचिव एवं मुख्य अभियन्ता स्वर्गीय श्री कंवरसेन द्वारा की गई और उन्होंने इसकी योजना बनाई। पंजाब में व्यास और सतलुज नदी के संगम पर स्थित जब ‘हरिके बैराज’ तैयार हो गया तो इस योजना के आधार पर केन्द्रीय जल विद्युत आयोग द्वारा जो रूपरेखा बनी, उससे 1955 और 1981 में नदी ‘जल वितरण समझौता’ हुआ। इसी से इन्दिरा गाँधी नहर को 75.9 लाख एकड़ फुट पानी के उपयोग का प्रस्ताव मिला।

व्यय राशि :- यदि इस नहर योजना के व्यय की ओर ध्यान दें तो शुरू में 1965 तक 66.45 करोड़ रुपये का अनुमान था, फिर 1970 में यह 200 करोड़ रुपये की हो गई। यह रकम बढ़कर 1977 में 396 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। 1989 में रकम की राशि 1,675 करोड़ रुपये और 1990 में एकदम बढ़कर 1,900 करोड़ रुपये हो गई। वास्तविक खर्च जनवरी 1992 तक 942 करोड़ का ही हुआ है। बताया गया है कि सन 2000 तक यह विश्व की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण नहर 2,900 करोड़ तक पहुँच जाएगी। इसका आशय यह है कि इसके व्यय का अनुमान 21 वीं सदी के प्रारंभ में 2,900 करोड़ हो जाएगा। यह भी अनुमान था कि नहर का पूरा कार्य सन 2004 तक पूर्ण हो जायेगा, जबकि इसके अतिरिक्त कार्य के सन 2007 तक पूरे होने की आशा थी। वैसे इतिहास में 1 जनवरी 1987 का दिन स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेगा, जब इस जीवनदायिनी मरु गंगा की लम्बी यात्रा विशाल एवम दुर्गम रेतीले क्षेत्र को चीर कर 649 किलोमीटर तक पहुँची। यह जलयात्रा इसकी वास्तव में जय यात्रा है। इस यात्रा से जैसलमेर का मोहनगढ़ एक तीर्थ बन गया।

योजना के परिणाम :- आरम्भ में यह कल्पनाशील नहर राजस्थान के नाम से थी, परन्तु स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के देहान्त के बाद उनकी स्थाई स्मृति के लिये इसका नाम इन्दिरा गाँधी नहर कर दिया गया। इस नहर से पूरे मरु प्रदेश में चहुँमुखी प्रगति हुई है। प्रोजेक्ट पूरा होने पर इस क्षेत्र की जनसंख्या कोई एक करोड़ बढ़ जाएगी। लगभग 40 नए शहरों का निर्माण होगा। 6 हजार नए ग्राम विकासित हो जाएंगे। अभी 1,500 ग्रामों को पीने के पानी का लाभ मिल रहा है। बालू के टीलों के अंधड़ काफ़ी कम हो गए हैं- उनकी तूफानी गति कम हो गई है और 1.46 लाख हेक्टेयर भूमि में वन विकास कार्य किया जा रहा है। अभी सिंचाई 7.10 लाख हेक्टेयर भूमि में होती है। नहर पूरा होने पर अब सिंचाई कार्य 15.37 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में करने का लक्ष्य है। इस प्रकार 8.50 हेक्टेयर नए क्षेत्र में सिंचाई क्षमता अर्जित की गई है। पशु पालन में वृद्धि, लाखों लोगों को अतिरिक्त रोजगार और दुग्ध विकास में बढ़ोत्तरी इस योजना के परिणाम हैं। किसे मालूम नहीं है कि पूरे देश का चना अधिकांश में इसी नहर क्षेत्र में उत्पन्न होता है। कपास की खेती ने सभी आंकड़े तोड़ दिए है। मूँगफली सभी स्थानों पर यहाँ से पहुँचती है।

राष्ट्रीय हित की वृहद सिंचाई परियोजना :- इस नहर के विशाल निर्माण कार्य की, जहाँ 44 करोड़ घनमीटर क्षेत्र में कार्य हुआ है। एवरेस्ट की ऊँचाई और 350 मीटर गुणा 350 मीटर आधार के पिरामिड के निर्माण के बराबर का कार्य होगा, क्या कम आश्चर्यजनक है? इस नहर के निर्माण में 30 करोड़ मानव दिनों के बराबर कार्य हुआ है। परियोजना के लिये किए गए मिट्टी के कार्य से पृथ्वी के चारों ओर 6 मीटर चौड़े एवं 1.2 मीटर ऊँचे तटबंध का निर्माण किया जा सकता है। नहर को पक्का करने वाली टाइलों की ओर ध्यान दें तो उनसे पृथ्वी के चारों ओर चार मीटर चौड़ी सड़क का निर्माण हो सकता है। वास्तव में देखा जाए तो इसकी विशालता बारह महीनों बहने वाली एक नदी के समान है, इसीलिए कहा गया है कि इस क्षेत्र में प्राचीन समय में बहने वाली सरस्वती नदी का एक प्रकार से पुनः अवतरण हो गया है। इन्दिरा गाँधी नहर एक ऐसी राष्ट्रीय हित की वृहद सिंचाई परियोजना है, जो राजस्थान के लिये सार्थक व कल्याणकारी तो है ही, साथ ही पूरे देश की समृद्धि के लिये एक ठोस योजना सिद्ध हो चुकी है।

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