ग्लोब क्या है

थिमैटिक मानचित्र क्या है , ग्लोब किसका प्रतिरूप है , ग्लोब का आविष्कार कब हुआ , ग्लोब पर भारत की स्थिति क्या है , उपयोगिता के आधार पर मानचित्र कितने प्रकार के होते हैं , लघु मान वाले मानचित्र के विभिन्न प्रकार कौन कौन से हैं , थीमेटिक मानचित्र क्या है,

ग्लोब क्या है

ग्लोब क्या है :- ग्लोब (Globe) पृथ्वी के छोट रूप में देखावे वाला मॉडल होला। ई पृथ्वी के पैमाना अनुसार छोट रूप में देखावे ला आ बिबिध काम में इस्तेमाल होखे ला। कौनों गोलआकार चीज, जेकरे त्रिज्या आ पृथ्वी के त्रिज्या में ख़ास अनुपात होखे (इहे पैमाना कहाला) पर अक्षांश-देशांतर रेखा सभ के जाल आ महादीप आ महासागर सभ के चित्र बनावल गइल होला आमतौर पर ई धुरी के सहारे लगभग ओतने झुका के देखावल गइल रहे ला जेतना कि पृथ्वी अपने कक्षा-तल पर झुकाव लिहले नक्शा बनावे में, गोलाकार सतह के सपाट सतह पर देखावे के बिधि, नक्शा प्रोजेक्शन बनावे में ग्लोब भा ग्लोब के कांसेप्ट (कल्पित ग्लोब) के खास महत्व होला।

बच्‍चों को ग्लोब के साथ खेलने के कारण :- ग्लोब पृथ्वी का त्रिआयामी मॉडल है जिसका अध्ययन विश्व भर के विभिन्न स्थानों की स्थिति जानने के लिए किया जाता है। प्रस्तुत लेख में विस्तृत रूप से यह बताने की कोशिश की गई है कि ग्लोब का अध्‍ययन-अध्यापन भली प्रकार कैसे किया जा सकता है। शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को ग्लोब के साथ खेलने का अवसर प्रदान करने से ही ग्लोब के बारे में समझा जा सकता है। खेल के प्रति हर बच्चा आकर्षित होता है। अनेक जटिल संकल्‍पनाएँ भी बच्‍चे खेल के माध्‍यम से समझ जाते हैं।

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विद्यालयों में ग्लोब अध्ययन की स्थिति :- देश भर के विभिन्न विद्यालयों में चाहे निजी हों या सरकारी, ग्लोब विद्यालय के प्रिंसिपल के कमरे की शोभा बढ़ाता दिखाई पड़ता है। लेखिका को शैक्षिक शोध के दौरान भारत के अनेक विद्यालयों में जाने पर ऐसा अनुभव हुआ है। लेकिन क्या उन विद्यालयों के विद्यार्थियों ने ग्लोब अपनी कक्षा में देखा है? या कभी-कभार देखा भी है तो क्या कभी उसे छुआ है? कभी छुआ भी है तो कभी उस पर उँगलिया फिराईं हैं? इसका उत्तर हमेशा ‘न’ में मिलता है। क्योंकि ग्लोब को विद्यालयों में बहुत सम्‍भाल कर रखा जाता है। इसका प्लास्टिक का कवर और दफ्ती का डब्बा भी भली प्रकार सुरक्षित रखा रहता है। इसका कारण है कि अगर ग्लोब किसी भी वजह से खराब हो गया तो इसकी भरपाई भूगोल के शिक्षक को अपने पैसे से करनी होती है। यही एक ऐसा बड़ा कारण है कि जिससे शिक्षक ग्लोब का प्रयोग रोज-रोज कक्षा में करना नहीं चाहते। शिक्षक या शिक्षिकाएँ अपने साथ ग्लोब लाते भी हैं तो वह भी कक्षा के शुरुआती दिनों में अपनी मेज पर रखकर कक्षा में उपस्थित साठ-सत्तर बच्चों को दिखाते हैं कि यह हमारी पृथ्वी का एक माडल है जिसमें अक्षांश और देशांतर बने हुए हैं, महाद्वीप, महासागर और देश भी बने हुए हैं। सभी बच्चे इसे ध्यान से देख लो। पीछे की कतार में कोने में बैठे बच्चे से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी जगह बैठे हुए ध्यान से उस ग्लोब को देख ले, वह भी कक्षा में बिना व्यवधान किए। और इस प्रकार पूरे शैक्षणिक सत्र में एक दिन में ही ग्लोब पर आधारित पाठ का पठन-पाठन पूर्ण हो जाता है। बच्चों के दिमाग में पूरी तरह से यह बैठ जाता है कि ग्लोब नीले रंग की एक गेंद की तरह की कोई चीज होती है जो हमारी पृथ्वी की तरह है। जीवन भर ग्लोब की इस स्‍मृतिे के साथ ही बच्चे साल दर साल अध्ययन करते चले जाते हैं।

रोचक वार्तालाप तथा प्रश्‍नों के माध्यम से ग्लोब की बातें खेल-खेल में :- पहली बात, ग्लोब को दूर से नहीं समझाया जा सकता है। इसके लिए शिक्षक से अपेक्षा है कि वह विद्यार्थियों को ग्लोब के साथ जुड़ने का अवसर दे। विद्यार्थी इस ग्लोब को ऊपर से नीचे तक अपने हाथ से छुएँ और इसे घुमाएँ। ग्लोब पर क्या-क्या दिखाई दे रहा है उसे बताते जाएँ। यहाँ शिक्षक एक सहायक की भूमिका में होना चाहिए। शिक्षक का कर्तव्य है कि जिन बातों पर बच्चों की निगाह नहीं जा रही हो उसके बारे में उन्हें बीच-बीच में याद दिलाए। जैसे ग्लोब किस आकार का है? मुख्य रूप से किस रंग का दिखाई देता है ? कुछ अलग-अलग रंग भी उस पर दिखाई दे रहे हैं वह क्या हैं ? कुछ रेखाएँ भी बनी हैं, कुछ रेखाएँ चिकनी हैं, कुछ डैश के साथ बनी हैं। एक रेखा तो जिग-जैग जैसी बनी है। बच्चों से यह पूछना चाहिए कि यह ग्लोब एक स्टैंड पर स्थापित है तो क्या इसी प्रकार हमारी पृथ्वी भी एक स्टैंड पर स्थापित है ? वे क्या सोचते हैं ? ग्लोब को घुमाकर देखो तो यह दोनों तरफ दाएँ-बाएँ घूम रहा है। क्या हमारी पृथ्वी भी इसी प्रकार दोनों तरफ घूमती है ? अगर ऐसा नहीं है तो इसका अर्थ है कि ग्लोब पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों की स्थिति को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है न कि पृथ्वी की अन्‍तरिक्ष में उसकी उपस्थिति तथा उसकी गति को समझने के लिए। इन बातों को समझने के लिए हमें अन्य संसाधनों का उपयोग करना होता है। ओैर अभी हमारा उद्देश्‍य तो केवल ग्लोब को समझना है।
बच्चों का ध्यान ग्लोब के ऊपरी तथा निचले सिरे के स्थित पेंच की तरफ आकर्षित करना चाहिए जो क्रमश: उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव को प्रदर्शित करते हैं। पूरा ग्लोब नीले रंग का दिखाई देता है क्योंकि हमारी पृथ्वी का एक तिहाई से अधिक भाग जल से घिरा है और जलीय भाग नीले रंग के द्वारा प्रदर्शित हैं। इसलिए ग्लोब नीले रंग का दिखाई देता है। इस पर अलग-अलग रंगों में स्थलीय भाग दिखाए गए हैं जो महाद्वीपों और द्वीप समूहों के रूप में हैं। अब विद्यार्थियों से कहना होगा कि जोर-जोर से नाम पढ़ते हुए और ग्लोब को हाथ से घुमाते हुए महाद्वीपों और द्वीपों के नाम पढ़ें। इसी प्रकार महासागरों का नाम भी पढ़ें। विद्यार्थियों से पूछा जा सकता है कि ग्लोब पर कुछ स्थान जैसे ग्रीनलैंड, आर्कटिक और अंटार्टिका सफेद रंग से क्यों दिखाए गए हैं? इसका कारण भी उन्हें बताना होगा कि ये अत्यधिक ठण्डे स्थल हैं और यहाँ साल भर बर्फ जमा रहती है।

ग्लोब पर अक्षांश कैसे बढ़े :- ग्लोब को ध्यान से देखने पर हमें काले रंग की रेखाएँ बनी दिखाई देती हैं। कुछ रेखाएँ पूरे ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर बनी हैं। बच्चों के लिए आवश्‍यक है कि इन सब रेखाओं को समझने के लिए उन पर उँगलियाँ खुद फिराएँ। प्रत्येक विद्यार्थी को यह अवसर मिलना चाहिए कि वह स्वयं उत्तर से दक्षिण ध्रुव को मिलाने वाली रेखा(देशांतर) और पश्चिम से पूर्व की ओर खिंची रेखा जो एक वृत्त बना रही है (अक्षांश) उसके अन्‍तर को पहचानें। अब विद्यार्थियों से पूछना होगा कि उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव के बीच ऐसे कितने वृत्त दिखाई दे रहे हैं उन्‍हें गिनें। अगर 150 के अन्‍तराल पर वृत्त बने हैं तो उत्तर से दक्षिण कुल ग्यारह वृत्त बने हैं। अब पूछना होगा कि इनमें से सबसे बड़ा वृत्त कौन-सा है। विद्यार्थी उत्साहित होकर बताएँगे कि छठी संख्या का वृत्त सबसे बड़ा है। इसके साथ उनका ध्यान आकर्षित करना होगा कि छठी संख्या के वृत्त से उत्तर तथा दक्षिण की ओर इन वृत्तों का आकार कम होता जाता है। यह सभी रेखाएँ अक्षांश रेखाएँ कहलाती हैं तथा जो सबसे बड़ी अक्षांश रेखा है उसे विषुवत रेखा या जीरो डिग्री अक्षांश कहते हैं। विद्यार्थी स्वयं विषुवत रेखा को पढ़ेंगे और उस पर हाथ फिराएँगे और ग्लोब को घुमा-घुमाकर देखेंगे। वह इस पर भी ध्यान देंगे कि यह विषुवत रेखा ग्लोब के बिल्कुल बीच में स्थित है और बच्चों को बताना होगा कि उत्तर स्थित भाग को उत्तरी गोलार्ध तथा दक्षिणी भाग को दक्षिणी गोलार्ध कहते हैं। अब विद्यार्थियों से पूछना होगा कि क्या उन्हें इन अक्षांश रेखाओं पर कुछ संख्या लिखी दिखाई दे रही है। वे स्वयं ग्लोब को घुमा-घुमाकर देखेंगे और एक स्थान पर प्रत्येक अक्षांश के ऊपर उत्तर से दक्षिण क्रमश: 00, 150, 300,450,600,750,900 उत्तर तथा दक्षिण लिखा पाएँगे। अतः वे जान जाएँगे कि 00 अक्षांश यानी विषुवत रेखा सबसे बड़ी दिख रही है और क्रमश: उत्तर तथा दक्षिण की ओर अक्षांशों की लम्‍बाई कम होती जा रही है और 750 के बाद उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों पर यह 900 उत्तर तथा दक्षिण के रूप में एक बिन्दु द्वारा प्रदर्शित है। अब बच्चों से पूछें कि क्या उन्हें 150 उत्तरी अक्षांश तथा 300 उत्तरी अक्षांश के बीच में कोई टूटी हुई रेखा (डेश लाईन) दिखाई दे रही है और उसी प्रकार की रेखा दक्षिणी गोलार्ध में 150 दक्षिण तथा 300 दक्षिण अक्षांश के बीच में भी बनी है जिस पर क्रमश: 23.50 उत्तर कर्क रेखा तथा 23.50 दक्षिण मकर रेखा अंकित है। कर्क तथा मकर रेखाएँ किन-किन महाद्वीपों और देशों से होकर गुजर रही हैं यह बच्चे ग्लोब को घुमा-घुमाकर उन रेखाओं पर हाथ रखते हुए आसानी से बता देते हैं। जैसी अक्षांश रेखाएँ विषुवत रेखा के उत्तर में बनी हैं वैसी ही उसके दक्षिण में बनी हैं। एक बात और जो ध्यान देने योग्य है कि ये अक्षांश रेखाएँ आपस में बराबर दूरी पर हैं और ये एक-दूसरे को नहीं छू रही हैं, समानांतर रेखा के रूप में बनी हैं। यह सारी बातें बच्चे स्वयं ही ग्लोब को परखेंगे और बताएँगे। शिक्षक केवल एक सहायक के रूप में बीच-बीच में रोचक प्रश्‍न पूछकर बच्चों के मन में जिज्ञासा और कौतूहल उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

ग्लोब पर देशांतर कैसे बढ़े :- अब देशांतर रेखाओं पर ध्यान खींचें। ये रेखाएँ जो उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव को जोड़ रही हैं, देशांतर रेखाएँ हैं और ये सभी रेखाएँ आकार में बराबर यानी अक्षांश रेखाओं की तरह छोटी-बड़ी नहीं हैं। बच्चे खुद बताते हैं कि उत्तर तथा दक्षिण की ओर ये पास-पास हैं और बीच में इनके बीच की दूरी ज्यादा है। अब उनसे पूछें कि इन सब रेखाओं पर भी कहीं कुछ अंक लिखे हैं। ग्लोब को घुमा-घुमाकर ढूँढ़ने पर वे खोज लेंगे कि एक स्थान पर संभवतः जीरो डिग्री विषुवत रेखा को जहाँ ये काट रहे हैं वहाँ इन पर जीरो डिग्री से पूर्व की ओर 150, 300,450,600,750,900,1050,1200 ,1350,1500,1650,1800 पूर्व इसी प्रकार जीरो डिग्री की देशांतर रेखा पश्चिम की ओर भी ऐसे ही 150, 300,450,600,750,900,1050,1200 ,1350,1500,1650,1800 पश्चिम लिखा है। इन सभी अंकों को प्रत्येक विद्यार्थी खुद देखें और पढ़कर बताएँ। अब ग्लोब पर 150 देशांतर पर एक उँगली रखें और दूसरे हाथ की उँगली उस पर फिराते हुए ग्लोब का दूसरा हिस्सा जो उसके सामने नहीं पड़ रहा है वहाँ तक ले जाएँ। 150 पूर्वी देशांतर से उत्तरी ध्रुव होते हुए जब हमारा हाथ उसी रेखा से गुजरता हुआ विषुवत रेखा पर आता है तो उस पर लिखा मिलता है 1650 पश्‍चिम। इसका मतलब यह है कि ये दोनों ही देशांतर मिलकर एक वृत्त बनाते हैं। इसी प्रकार किसी भी अन्य डिग्री देशांतर पर एक तरफ हाथ रखें और दूसरे हाथ से उस पर उँगली फिराते हुए ग्लोब के दूसरी तरफ ले जाएँ और उस देशांतर पर अंकित डिग्री को पढ़ें, अब 00 देशांतर पर अपना हाथ रखें और फिर वही प्रक्रिया हम अपनाएं, हम पाते हैं कि जो देशांतर रेखा एक तरफ 00 देशांतर दिखलाती है वही दूसरी तरफ 1800 देशांतर प्रदर्शित करती है। इस प्रकार 00 तथा 1800 देशांतर मिलकर एक सम्पूर्ण वृत्त बनाते हैं। हालाँकि सभी देशांतर वृत्त पूरे ग्लोब को दो बराबर भागों में विभाजित करते हैं लेकिन सुविधा के लिए 00 देशांतर तथा 1800 देशांतर को ग्लोब के मध्य में स्थित देशांतर वृत्त माना गया है जो ग्लोब को पूर्वी तथा पश्चिमी गोलार्ध में विभाजित करता है। अतः कुल मिला कर 360 देशांतर रेखाएँ पूरे ग्लोब पर अंतराल के रूप में प्रदर्शित होती हैं। अब विद्यार्थियों को उत्साहित करें कि वे ढूँढें कि इन 00 तथा 1800 देशांतरों में से किस पर ग्रीनिच रेखा तथा अन्‍तर्राष्‍ट्रीय तिथि रेखा लिखी हुई है। बच्चे ढूँढ़कर बताएँगे कि 00 देशांतर पर ग्रीनिच रेखा तथा 1800 देशांतर पर अन्‍तर्राष्‍ट्रीय तिथि रेखा अंकित है साथ ही साथ 1800 अन्‍तर्राष्‍ट्रीय तिथि रेखा बीच-बीच में मुड़ रही है। शिक्षक यहाँ पर विद्यार्थियों को ग्रीनिच मध्य रेखा द्वारा समय का आंकलन करना भी सिखा सकते हैं और साथ ही साथ यह भी बता सकते हैं कि अन्‍तर्राष्‍ट्रीय तिथि रेखा से किस प्रकार दिन में बदलाव आ जाता है।

ग्लोब में अक्षांश और देशांतर रेखाओं का जाल बना हुआ है :- इसे बच्चे स्वयं देखेंगे। कक्षा में अत्यंत साधारण सरल तथा रूचिपूर्ण प्रश्‍नों को पूछकर विद्यार्थियों द्वारा अर्जित ज्ञान को दृढ़ किया जा सकता है। जैसे 150 उत्तरी अक्षांश और 800 पूर्वी देशांतर पर कौन सा देश स्थित है? इसी प्रकार उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम गोलार्ध में स्थित देशों का मुख्य अक्षांश तथा देशांतर पूछकर देशों की स्थिति बताई जा सकती है। किसी स्थान की स्थिति तथा विस्तार अक्षांश तथा देशांतर के माध्यम से ही व्यक्त किया जाता है। इसकी समझ विद्यार्थियों मे विकसित की जानी चाहिए, हमारा उद्देश्‍य ग्लोब के प्रति उत्सुकता और रूचि उत्पन्न करना होना चाहिए। सब कुछ एक साथ ही एक बार में ही या एक दिन में ही नहीं सिखाया जा सकता, हमें ग्लोब की बातें खेल-खेल में ही सिखानी होंगी। ग्लोब सामने रखकर ब्लैकबोर्ड पर चाक से ही ग्रिड बना कर समझाया जा सकता है।

ग्लोब तथा ब्लैकबार्ड पर चित्र, दोनों के माध्यम से अक्षांश तथा देशांतर का शिक्षण :- ग्लोब को हाथ में लेकर उसे घुमाना, उस पर बनी रेखाओं पर उँगलियाँ फिराना, अक्षांश, देशांतर रेखाओं के अंकों को स्वयं पढ़ना एक अलग ही अनुभव होता है। यह क्रियाकलाप क्विज का रूप भी ले सकता है। अक्षांश तथा देशांतर रेखाएँ काल्पनिक हैं। यह जमीन पर खिंची हुई नहीं हैं, ये बातें कक्षा में बताई जानी चाहिए इसके साथ ही ये रेखाएँ विश्‍व के प्रत्येक स्थान को एक विशिष्‍ट स्थान के रूप में स्थापित करती हैं, इसको एक विशिष्‍ट पहचान दिलाती हैं। पृथ्वी पर हर स्थान दूसरे स्थान से अलग एक विशेष अक्षांश देशांतर पर स्थित होता है चाहे उसमें डिग्री, मिनट या सेकेंड का ही अन्‍तर क्यों न हो। यह जानने के लिए ग्लोब का अध्ययन अति आवश्‍यक है जो ग्लोब के साथ जुड़कर खेल-खेल मे आसानी से सीखा जा सकता है। बच्चे हर वस्तु को स्पर्श के माध्यम से, अनुभव के द्वारा जानना चाहते हैं तो उन्हें विद्यालय में ऐसा अवसर दिए जाने का प्रयास शिक्षक द्वारा किया जाना चाहिए। क्योंकि स्वयं कुछ करके सीखना एक सुखद अनुभव होता है जिसमें आत्मसंतुष्टि तथा उपलब्धि का भाव निहित होता है।

General Science Notes

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