भारत की जलवायु
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भारत की जलवायु

भारत की जलवायु :- किसी क्षेत्र विशेष के लम्बी अवधि के दौरान मौसम संबंधी दशाओं को जलवायु कहा जाता है। भारत की जलवायु विविधतापूर्ण है। यहां एक स्थान से दूसरे स्थान में तथा एक ऋतु से दूसरी ऋतु में तापमान व वर्षा की मात्रा में काफी अंतर है। अत्यधिक प्रादेशिक भिन्नता भारत की जलवायु की विशेषता है क्योंकि ऐसी जलवायु विश्व में कहीं नहीं मिलती। भारत की जलवायु पर विषुवत् रेखा की निकटता, कर्क रेखा के मध्य से निकलने, कुछ भागों के समुद्र तल से काफी ऊंचे होने तथा समुद्र से तीन ओर से देश के घिरे होने का प्रभाव भी पड़ता है। असम में भारी वर्षा होती है तथा यहां की जलवायु आर्द्र है। राजस्थान में कम वर्षा होने के कारण यहां की जलवायु शुष्क है। पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलों में जहां ग्रीष्मकाल में दिन का तापमान 50° सेल्सियस तक पहुंच जाता है वहीं शीत ऋतु में जम्मू-कश्मीर में स्थित द्रास एवं कारगिल में तापमान शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस नीचे चला जाता है। इसी तरह जहां मेघालय (मॉसिनराम, चेरापूंजी) व असम में 900-1000 सेमी. तक वर्षा होती है वहीं उसी अवधि में राजस्थान के जैसलमेर आदि क्षेत्रों में लगभग 10-12 से.मी. ही वर्षा होती है।

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जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक – जलवायु को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं :-
1) अक्षांश: कर्क रेखा भारत के मध्य से गुजरती है जिसके कारण क्षेत्र का तापमान सापेक्षतया अधिक रहता है। मैदानी क्षेत्र भी 32° उ. अक्षांशों के अंतर्गत ही स्थित है।
2) समुद्र से निकटता: सामान्यतः जो प्रदेश अथवा क्षेत्र समुद्र के समीप होते हैं वहां की जलवायु प्रायः एक समान होती है। इसीलिए भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग के प्रदेशों के तापमान में विभिन्नताएं द्रष्टव्य होती हैं।
3) मानसूनी पवने: मानसूनी पवनें ग्रीष्मकाल में दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हैं व शीत काल में इनके बहने की दिशा उत्तर-पूर्व हो जाती है। ये मानसूनी पवनें वर्षा की मात्रा, आर्द्रता व तापमान को प्रभावित करती हैं। मानसून आने का समय व तीव्रता- (1) उष्णीय विषमता; (2) अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण, एवं; (3) जैट-स्ट्रीम पर निर्भर करता है।
4) उच्चावच: हिमालय, पश्चिमी घाट एवं पूर्वाचल की पहाड़ियां तापमान तथा वर्षा की मात्रा को प्रभावित करती हैं।
5) मिट्टी की प्रकृति: विभिन्न प्रकार की मिट्टियां तापमान को भिन्न-भिन्न दरों से अवशोषित करती हैं। राजस्थान की रेतीली मिट्टी की बजाय निम्न गंगा बेसिन क्षेत्र की कांप मिट्टी तापमान को अधिक तीव्रता से अवशोषित कर सकती है।

भारतीय जलवायु: उपोष्णीय मानसून :- मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के शब्द मौसिम से हुई है। इसके बारे में कहा जाता है अरब नाविक अरब सागर में वर्ष के 6 माह उत्तर-पूर्व दिशा से तथा शेष 6 माह दक्षिण-पश्चिम दिशा से चलने वाली हवाओं के लिए किया करते थे। ये हवाएं भारत और पूर्वी अफ्रीका के बीच चला करती थीं। वस्तुतः अलग-अलग ऋतुओं में अलग-अलग प्रकार की पवनों द्वारा भारत की जलवायु प्रभावित होती है, सामान्य रूप में मानसून हवाएं धरातल की संवहनीय क्रम की ही हैं, जिनका अविर्भाव स्थल तथा जल के विरोधी स्वभाव के कारण तथा तापीय विभिन्नता के कारण होता है। वे भाग जहां पर मानसून हवाओं का आधिक्य होता है, मानसूनी जलवायु प्रदेश कहे जाते हैं।

भारत के जलवायु क्षेत्र :- भारत की विशालता व अनेक स्थलाकृतिक विशेषताओं के कारण भारत का विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में विभाजन कर पाना एक कठिन कार्य है। जलवायु क्षेत्रों में विभाजन का आधार मुख्यतः वर्षा की मात्रा एवं तापमान को बनाया गया है। जलवायु क्षेत्र विभाजन के निम्नलिखित प्रयास

कोपेन का वर्गीकरण :- कोपेन ने 1918 में भारत को विभिन्न जलवायु प्रदेशों में विभाजित करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। कोपेन ने जलवायु प्रदेश विभाजन के लिये वार्षिक मासिक तापमान, वर्षा की मात्रा, स्थानीय वनस्पति को आधार माना। उन्होंने भारत की जलवायु को निम्नलिखित

भागों में विभाजित किया है :-
1) अल्पशुष्क ऋतु वाले मानसून प्रकार के क्षेत्र (Amw): इस क्षेत्र के अंतर्गत मालाबार व कोंकण तट के क्षेत्र आते हैं। शीत ऋतु प्रायः शुष्क होती है परंतु ग्रीष्म ऋतु में 200 सें.मी. से अधिक वर्षा होती है व यहां उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन पाये जाते हैं।
2) उष्ण कटिबंधीय सवाना प्रकार के क्षेत्र (Aw): इसके अंतर्गत प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश भाग आते हैं। यहां शीत ऋतु शुष्क व ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होती है।
3) दीर्घावधि ग्रीष्म ऋतु वाले शुष्क मानसून प्रकार को क्षेत्र (As): कोरमण्डल तट पर ऐसी जलवायु मिलती है। शीत ऋतु में इन स्थानों पर वर्षा होती है व उष्ण कटिबंधीय सवाना प्रकार की जलवायु मिलती है।
4) अर्द्ध शुष्क स्टेपी जलवायु क्षेत्र (Bsha): अर्द्ध शुष्क स्टेपी जलवायु क्षेत्र के अंतर्गत राजस्थान व हरियाणा के कुछ भाग आते हैं। यहां ग्रीष्मकाल में साधारण वर्षा होती है व अर्द्ध-मरुस्थलीय शुष्क जलवायु पाई जाती है।
5) शुष्क उष्ण मरुस्थलीय जलवायु क्षेत्र (Bwhw): इसके अंतर्गत पश्चिमी राजस्थान के क्षेत्र आते हैं। इन क्षेत्रों में तापमान अधिक व अत्यंत कम वर्षा होती है।
6) समशीतोष्ण आर्द्र जलवायु क्षेत्र (Cwg): भारत के मैदानी क्षेत्र इस जलवायु क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। यहां ग्रीष्म ऋतु में वर्षा व शीत ऋतु शुष्क होती है।
7) शीतोष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु (Dcf): भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में इस प्रकार , की जलवायु पाई जाती है। यहां सभी ऋतुओं में वर्षा होती है।
8) ध्रुवीय प्रकार की जलवायु वाले क्षेत्र (E): इसके अंतर्गत कश्मीर व निकटवर्ती पर्वतमालाएं आती हैं। यहां सर्वाधिक तापमान 10 °C तक जाता है।
9) टुण्ड्रा प्रकार की जलवायु वाले क्षेत्र (Et): उन पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी जलवायु पांई जाती है जहां तापमान 0°C से 10°C के मध्य रहता है व ऊंचाई बढ़ने पर तापमान में कमी आती है। उत्तर प्रदेश के पर्वतीय अंचलों में ऐसी जलवायु पाई जाती है।

ट्रिवार्था का वर्गीकरण :- ट्रिवार्था ने भारत के जलवायु प्रदेशों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है, भारतीय जलवायविक क्षेत्रों में किए गए अभी तक से सभी वर्गीकरणों में ट्रिवार्था द्वारा किया गया वर्गीकरण अधिक संतोषजनक है। वस्तुतः ट्रिवार्था द्वारा किया गया वर्गीकरण कोपेन के वर्गीकरण का ही सुधरा हुआ रूप है। ट्रिवार्था में सम्पूर्ण भारत को चार वर्गों-A,B, C और H प्रकार-में विभाजित किया है। उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु, जहां का तापमान उच्च बना रहता है, को A प्रकार की जलवायु कहा गया है। B प्रकार उच्च तापमान किंतु निम्न वर्षा युक्त शुष्क जलवायु की ओर इंगित करता है। C प्रकार के क्षेत्र वे हैं जहां 0°C से 18°C के मध्य के निम्न तापमान युक्त शुष्क सर्दी वाली जलवायु विद्यमान रहती है। H प्रकार पर्वतीय जलवायु का संकेतक है। A, B और C प्रकारों को पुनः उप-विभाजित किया गया है। इस प्रकार यहां सात प्रकार के जलवायविक क्षेत्र हैं-

उष्णकटिबंधीय वर्षा वन (Am) :- ये वन पश्चिमी तटीय मैदानों, सह्याद्री एवं असोम के कुछ भागों में पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों का तापमान सदैव उच्च रहता है तथा कभी-भी यहां तक कि सर्दियों में भी 18.2°C से नीचे नहीं गिरता। अप्रैल एवं मई में तापमान 29°C से अधिक हो जाता है। ये दोनों महीने इन क्षेत्रों के सर्वाधिक गर्म महीने माने जाते हैं। मौसम में वर्षा काफी अधिक होती है। यहां मई से नवम्बर तक लगभग 200 सेंमी. वर्षा होती है।

उष्ण कटिबंधीय सवाना (Aw) :- इस प्रकार की जलवायु पश्चिमी घाट के पवन विमुखी पार्श्व (Leeside) के अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र को छोड़कर अधिकांश प्रायद्वीपीय क्षेत्र में पाई जाती है। यहां सर्दियों के दौरान औसतन 18.2°C तथा गर्मियों के दौरान 32°C तापमान रहता है। यहां तापमान कभी-कभी 46°C से 48°C तक भी पहुंच जाता है। जून से सितम्बर तक वर्षा होती है, यद्यपि दक्षिण में यह दिसम्बर माह के अंत तक होती रहती है। वार्षिक वर्षा का वितरण असमान है; पश्चिम में जहां 76 सेंमी. वर्षा होती है, वहीं पूर्व में 152 सेंमी. वर्षा होती है।

उष्ण कटिबंधीय अर्द्ध-शुष्क स्टेपी जलवायु (BS) :- अत्यधिक वर्षा वाले इस जलवायविक क्षेत्र में मध्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंतरिक तमिलनाडु तथा पश्चिमी आंध्र प्रदेश आते हैं। इन क्षेत्रों में तापमान का वितरण विषमतापूर्ण है, जो कि दिसंबर में 20°C से 23.8°C तक तथा मई में 32.8°C तक रहता है। ये दोनों महीने इन क्षेत्रों के क्रमशः सबसे ठंडे और गर्म महीने हैं। यहां वार्षिक वर्षा 40 से 75 सेमी. तक होती है। अतः यह क्षेत्र भारत के अकाल प्रभावित क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।

उष्ण कटिबंधीय एवं उपोष्ण कटिबंधीय स्टेपी (BSh) :- इस प्रकार की जलवायु पंजाब, थार मरुस्थल, उत्तरी गुजरात एवं पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है। यहां 12°C (जनवरी) तथा 35°C (जून) के मध्य तापमान रहता है। ये दोनों महीने वर्ष के क्रमशः सबसे ठंडे और गर्म महीने हैं। यहां का अधिकतम तापमान 49°C तक भी पहुंच जाता है। यहां 30.5 से 63.5 सेंमी तक वर्षा होती है, साथ ही अत्यधिक अनियमित भी है।

उष्ण कटिबंधीय मरुस्थलीय (Bwh) :- यह जलवायु राजस्थान के बाडमेर, जैसलमेर और बीकानेर जिलों तथा कच्छ के कुछ भागों में पाई जाती है। यहां का तापमान औसतन उच्च रहता है (लगभग 34.5°C) मई और जून यहां के सबसे गर्म महीने हैं। सर्दियों में तापमान उत्तर की ओर घटता जाता है। वार्षिक वर्षा औसतन 30.5 सेमी. होती है, किंतु कुछ क्षेत्रों में 12.7 सेमी. से भी कम वर्षा होता है।

शुष्क शीत युक्त आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय जलवायु (Caw) :- दक्षिणी हिमालय के बड़े क्षेत्र, उशन कटिबन्धीय एवं उपोष्णकटिबन्धीय स्टेपी के पूर्व तथा उशन कटिबन्धीय सवाना के उत्तर में (पंजाब से असोम तक) यह जलवायु पाई जाती है। इनके अतिरिक्त राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला के पूर्व में भी यह जलवायु पाई जाती है। यहां सर्दियां सौम्य होती हैं। पश्चिमी क्षेत्र में ग्रीष्म ऋतु अत्यधिक गर्म होती है किंतु पूर्व में थोड़ी सौम्य (mild) हो जाती है। मई और जून सर्वाधिक गर्म महीने हैं। वार्षिक वर्षा 63.5 सेंमी. से 254 सेंमी. तक रहता है।

पर्वतीय जलवायु (H) :- इस प्रकार की जलवायु हिमालय जैसे 6000 मी. या अधिक की ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। यहाँ धुप्युक्त तापमान एवं चयित ढालों के तापमान के मध्य स्पष्ट विभाजन रहता है।

हिमालय पार पट्टी (Trans-Himalayan belt) :- जो कि पश्चिमी हिमालय के उत्तर में स्थित है, की जलवायु शुष्क एवं ठंडी है। यहां छितरी हुई और अविकसित प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। सर्दियाँ काफी ठंडी होती हैं और वर्षा अपर्याप्त होती है। प्रतिदिन एवं वार्षिक तापमान उच्च रहता है, हिमालय की दक्षिणी ढालें जहां अत्यधिक ठंड से रक्षा करती हैं, वहीं दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी पवनों के प्रवेश को भी सुगम बनाती हैं। यहां 1069-2286 मी. या अधिक की ऊंचाई वाली ढालों पर भारी वर्षा होती है।

थार्नथ्वेट का वर्गीकरण :- यह जलीय संतुलन की अवधारणा पर आधारित है। यदि किसी स्थान पर होने वाली वर्षा की मात्रा वाष्पीकरण या वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया में खर्च हुए जल की मात्रा से कम रहती है तो वह स्थान जल की न्यूनता रखता है। यदि यह आवश्यकता से अधिक है, तो अधिशेष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। थार्नथ्वेट द्वारा जले अधिशेष एवं जल-न्यूनता की मासिक मात्रा निश्चित करने के लिए एक सूत्र का विकास किया है। वर्ष के सभी महीनों में जल अधिशेष से प्रभावित क्षेत्र आर्द्र जलवायु के अंतर्गत तथा वर्ष के सभी महीनों में जल-न्यूनता से प्रभावित रहने वाले क्षेत्र शुष्क जलवायु के अंतर्गत रखे गये हैं। इन दोनों क्षेत्रों के अलावा जल-न्यूनता एवं जल-अधिशेष की मात्रा के आधार पर कई अन्य प्रकार के जलवायु क्षेत्रों का निर्धारण भी किया गया है।

थार्नथ्वेट की योजनानुसार निम्न जलवायु क्षेत्रों को पहचाना जा सकता है- (1) अति आर्द्र A, (2) आर्द्र B, (3) नम उपार्द्र C2 (4) शुष्क उपार्द्र C3 (5) अर्ध-शुष्क D, (6) शुष्क E ।
A प्रकार की जलवायु गोआ के दक्षिण में पश्चिम तट के साथ-साथ तथा उत्तर-पूर्वी भारत के कुछ भागों में पायी जाती है। B प्रकार की जलवायु A से जुड़े तटीय क्षेत्रों, उत्तरी-पश्चिमी बंगाल तथा पूर्वोत्तर भारत के निकटवर्ती क्षेत्रों में अपना प्रभाव दर्शाती है। C2, प्रकार की जलवायु पश्चिमी तट के साथ-साथ तथा ओडीशा व प. बंगाल में अनुभव की जा सकती है। गंगा की घाटी एवं मध्य भारत के उत्तरी-पूर्वी भाग C1 प्रकार की जलवायु से प्रभावित रहते हैं। प्रायद्वीपीय पठार के आंतरिक भाग, पश्चिमी मध्य प्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब में D प्रकार की जलवायु के चिन्ह प्राप्त होते हैं। E प्रकार की जलवायु के प्रभाव को सौराष्ट्र, कच्छ एवं राजस्थान में देखा जा सकता है।

वायुदाब एवं पवनों से जुड़े कारक :- भारत की स्थानीय जलवायु में पाई जाने वाली विविधता को समझने के लिए निम्नलिखित तीन कारकों की क्रिया विधि को जानना आवश्यक है
वायुदाब एवं पवनों का धरातल पर वितरण –
भूमंडलीय मौसम को नियंत्रित करने वाले कारकों एवं विभिन्न वायु संहतियों एवं जेट प्रवाह के अंतर्वाह द्वारा उत्पन्न उपरी वायु संचरण और, शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभ तथा दक्षिणी पश्चिमी मानसून काल में उष्णकटिबंधीय अवदाबों के भारत में अंतर वहन के कारण उत्पन्न वर्षा की अनुकूल दशाएं, उपर्युक्त 3 कारणों की क्रिया विधि को शीत व ग्रीष्म ऋतु के संदर्भ में अलग-अलग भली-भांति समझा जा सकता है |

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वायुदाब एवं पवनों का धरातल पर वितरण –
भूमंडलीय मौसम को नियंत्रित करने वाले कारकों एवं विभिन्न वायु संहतियों एवं जेट प्रवाह के अंतर्वाह द्वारा उत्पन्न उपरी वायु संचरण और, शीतकाल में पश्चिमी विक्षोभ तथा दक्षिणी पश्चिमी मानसून काल में उष्णकटिबंधीय अवदाबों के भारत में अंतर वहन के कारण उत्पन्न वर्षा की अनुकूल दशाएं , उपर्युक्त 3 कारणों की क्रिया विधि को शीत व ग्रीष्म ऋतु के संदर्भ में अलग-अलग भली-भांति समझा जा सकता है |

Indian Geography MCQ

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