बिजौलिया किसान आंदोलन

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बिजौलिया किसान आंदोलन

बिजौलिया किसान आंदोलन :- बिजौलिया किसान आंदोलन मेवाड़ रियासत में हुआ था जिसे धाकड़ जाट किसान आंदोलन भी कहा जाता है। 1897 ई. में साधू सिताराम दास के नेतृत्व में बिजौलिया किसान आन्दोलन की षुरूआत हुई। उस समय बिजोलिया के ठिकानेदार राव कृष्णसिंह थे और महाराणा फतेह सिंह थे बिजोलिया के किसानों से भू राजस्व निर्धारण और संग्रहण के लिए लाटा कुंता पद्धति प्रचलित थी इसके अंतर्गत किसान अपनी मेहनत की कमाई से भी वंचित रह जाता था |

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प्रथम प्रयास के लिए 1897 में उपरमाल के किसानों ने गिरधारीपुरा नमक ग्राम में सामूहिक रूप से किसानों की ओर से नानजी और ठाकरे पटेल को उदयपुर भेजकर ठिकाने के जुल्मों के विरुद्ध महाराणा से शिकायत करने का निर्णय किया लेकिन कोई कार्यवाही नहीं होने के कारण ठिकानेदार राव कृष्ण सिंह द्वारा नानजी और ठाकरी पटेल को उपरमाल से निर्वासित कर दिया गया, 1903 ई. में कृष्ण सिंह ने चंवरी कर लगा दिया। 5 रू. का यह कर किसानों की कन्याओं के विवाह के संबंधित था, उसके बाद 1906 में कृष्ण सिंह के निधन के पष्चात् पृथ्वी सिंह ने किसानों पर तलवार बंधाई कर लगा दिया। जो राज्यभिषेक संबंधी कर था। जिसके कारण किसानों ने साधु सीताराम दास, फतेह करण चारण एवं ब्रह्मदेव के नेतृत्व में विद्रोह किया, किसानों ने अपनी कन्याओं के विवाह स्थगित कर आन्दोलन तेज कर दिया। 1916 ई. में विजयसिंह पथिक इस आंदोलन से जुड़े, उनका वास्तविक नाम भूपसिंह गुर्जर था। अतः साधू सिताराम दास व रामनारायण चौधरी के आग्रह पर बिजौलिया के किसान नेतृत्व को स्वीकार कर लिया। इन्होने कानपुर से प्रकाषित प्रताप नामक समाचार पत्र के माध्यम से बिजौलिया के किसानों की दुर्दषा को उजागर किया।

बिजोलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व किसने किया :- 1917 में उपरमाल पंच बोर्ड की स्थापना की जिस का सरपंच श्री मन्ना पटेल को बनाया गया किसानों की मांगों के औचित्य की जांच करने के लिए अप्रैल 1919 में न्यायमूर्ति बिंदु लाल भट्टाचार्य जांच आयोग गठित हुआअतः गांधी जी जैसे बड़े नेता भी इस आन्दोेलन से जुडे, राजपूताने के एडीजी रोबर्ट होलेंड स्वयं 4 फरवरी 1922 को बिजोलिया गए होलैंड के प्रयासों से 11 जून 1922 को सम्मानजनक समझौता हुआ परिणामस्वरूप किसानों के 84 मे से 35 करो को समाप्त करने का आष्वासन दिया किन्तु 1922 ई. तक उन्हे क्रियान्वित नहीं किया गया। अतः किसानों ने आन्दोलन पुनः आरम्भ किया, बिजौलिया किसान आंदोलन के दौरान विजयसिंह पथिक पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया जिसके कारण 1927 को पथिक जी इस आंदोलन से अलग हो गए और नेतृत्व सेठ जमुनालाल जी एवं हरिभाऊ जी उपाध्याय के हाथ में आ गया |
आन्दोलन के अन्त में माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय तथा जमनालाल बजाज ने बिजौलिया किसान आन्दोलन का नेतृत्व किया। 1941 ई. में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी विजय राघवाचार्य ने राजस्व विभाग के मंत्री डॉक्टर मोहन सिंह मेहता को बिजोलिया भेजा उन्होंने माणिक्य लाल वर्मा के नेतृत्व में किसानों की सभी मांगे मान मान कर उनकी जमीने वापस दिलवा दी, लगभग 44 वर्षो तक चला किसान आन्दोलन अन्त में सफल हुआ। यह आन्दोलन पूर्णतः अहिंसात्मक किसान आन्दोलन था। श्री वर्मा जी के जीवन की यह प्रथम बड़ी सफलता थी यह आंदोलन भारत वर्ष का प्रथम व्यापक और शक्तिशाली किसान आंदोलन था |

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