कुषाण वंश का उदय, रेशम मार्ग पर किया कब्जा

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कुषाण वंश :- ‘युइशि जाति’, जिसे ‘यूची क़बीला’ के नाम से भी जाना जाता है, का मूल अभिजन तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में ‘तकला मक़ान’ की मरुभूमि के सीमान्त क्षेत्र में था। हूणों के आक्रमण प्रारम्भ हो चुके थे युइशि लोगों के लिए यह सम्भव नहीं था कि वे बर्बर और प्रचण्ड हूण आक्रान्ताओं का मुक़ाबला कर सकते। वे अपने अभिजन को छोड़कर पश्चिम व दक्षिण की ओर जाने के लिए विवश हुए। उस समय सीर नदी की घाटी में शक जाति का निवास था। यूची क़बीले के लोगों ने कुषाण वंश प्रारम्भ किया, युइशि लोगों के पाँच राज्यों में अन्यतम का कुएई-शुआंगा था 25 ई. पू. के लगभग इस राज्य का स्वामी कुषाण नाम का वीर पुरुष हुआ, जिसके शासन में इस राज्य की बहुत उन्नति हुई। उसने धीरे-धीरे अन्य युइशि राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया। वह केवल युइशि राज्यों को जीतकर ही संतुष्ट नहीं हुआ, अपितु उसने समीप के पार्थियन और शक राज्यों पर भी आक्रमण किए। अनेक ऐतिहासिकों का मत है, कि कुषाण किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं था। यह नाम युइशि जाति की उस शाखा का था, जिसने अन्य चारों युइशि राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। जिस राजा ने पाँचों युइशि राज्यों को मिलाकर अपनी शक्ति का उत्कर्ष किया, उसका अपना नाम कुजुल कडफ़ाइसिस था। पर्याप्त प्रमाण के अभाव में यह निश्चित कर सकना कठिन है कि जिस युइशि वीर ने अपनी जाति के विविध राज्यों को जीतकर एक सूत्र में संगठित किया, उसका वैयक्तिक नाम कुषाण था या कुजुल था। यह असंदिग्ध है, कि बाद के युइशि राजा भी कुषाण वंशी थे। राजा कुषाण के वंशज होने के कारण वे कुषाण कहलाए, या युइशि जाति की कुषाण शाखा में उत्पन्न होने के कारण—यह निश्चित न होने पर भी इसमें सन्देह नहीं कि ये राजा कुषाण कहलाते थे और इन्हीं के द्वारा स्थापित साम्राज्य को कुषाण साम्राज्य कहा जाता है।कुषाण वंश का उदय

कुषाण वंश का प्रारम्भ :- कुषाण वंश (लगभग 30 ई. से लगभग 225 ई. तक) ई. सन् के आरंभ से शकों की कुषाण नामक एक शाखा का प्रारम्भ हुआ। विद्वानों ने इन्हें युइशि, तुरूश्क (तुखार) नाम दिया है । युइशि जाति प्रारम्भ में मध्य एशिया में थी। वहाँ से निकाले जाने पर ये लोग कम्बोज-बाह्यीक में आकर बस गये और वहाँ की सभ्यता से प्रभावित रहे। हिंदुकुश को पार कर वे चितराल देश के पश्चिम से उत्तरी स्वात और हज़ारा के रास्ते आगे बढ़ते रहे। तुखार प्रदेश की उनकी पाँच रियासतों पर उनका अधिकार हो गया। ई. पूर्व प्रथम शती में कुषाणों ने यहाँ की सभ्यता को अपनाया। कुषाण वंश के जो शासक थे उनके नाम इस प्रकार है-
* कुजुल कडफ़ाइसिस: शासन काल (30 ई. से 80 ई तक लगभग)
* विम तक्षम: शासन काल (80 ई. से 95 ई तक लगभग)
* विम कडफ़ाइसिस: शासन काल (95 ई. से 127 ई तक लगभग)
* कनिष्क प्रथम: शासन काल(127 ई. से 140-50 ई. लगभग)
* वासिष्क प्रथम: शासन काल (140-50 ई. से 160 ई तक लगभग)
* हुविष्क: शासन काल (160 ई. से 190 ई तक लगभग)
* वासुदेव प्रथम
* कनिष्क द्वितीय
* वशिष्क
* कनिष्क तृतीय
* वासुदेव द्वितीय
* कुजुल कडफ़ाइसिस
कुषाण वंश का उदय
मुख्य लेख : कुजुल कडफ़ाइसिस :- कुषाणों के एक सरदार का नाम कुजुल कडफ़ाइसिस था । उसने क़ाबुल और कन्दहार पर अधिकार कर लिया । पूर्व में यूनानी शासकों की शक्ति कमज़ोर हो गई थी, कुजुल ने इस का लाभ उठा कर अपना प्रभाव यहाँ बढ़ाना शुरू कर दिया पह्लवों को पराजित कर उसने अपने शासन का विस्तार पंजाब के पश्चिम तक स्थापित कर लिया। मथुरा में इस शासक के तांबे के कुछ सिक्के प्राप्त हुए है ।
कुषाण वंश का उदय
मुख्य लेख : विम तक्षम :- विम तक्षम लगभग 60 ई. से 105 ई. के समय में शासक हुआ होगा। विम बड़ा शक्तिशाली शासक था। अपने पिता कुजुल के द्वारा विजित राज्य के अतिरिक्त विम ने पूर्वी उत्तर प्रदेश तक अपने राज्य की सीमा स्थापित कर ली। विम ने राज्य की पूर्वी सीमा बनारस तक बढा ली। इस विस्तृत राज्य का प्रमुख केन्द्र मथुरा नगर बना। विम के बनाये सिक्के बनारस से लेकर पंजाब तक बहुत बड़ी मात्रा में मिले है।

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मुख्य लेख : कनिष्क :- कनिष्क कुषाण वंश का प्रमुख सम्राट कनिष्क भारतीय इतिहास में अपनी विजय, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी होने के नाते विशेष स्थान रखता है। कुमारलात की कल्पनामंड टीका के अनुसार इसने भारतविजय के पश्चात् मध्य एशिया में खोतान जीता और वहीं पर राज्य करने लगा। इसके लेख पेशावर, माणिक्याल (रावलपिंडी), सुयीविहार (बहावलपुर), जेदा (रावलपिंडी), मथुरा, कौशांबी तथा सारनाथ में मिले हैं, और इसके सिक्के सिंध से लेकर बंगाल तक पाए गए हैं। कल्हण ने भी अपनी ‘राजतरंगिणी’ में कनिष्क, झुष्क और हुष्क द्वारा कश्मीर पर राज्य तथा वहाँ अपने नाम पर नगर बसाने का उल्लेख किया है। इनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्राट कनिष्क का राज्य कश्मीर से उत्तरी सिंध तथा पेशावर से सारनाथ के आगे तक फैला था।
कुषाण वंश का उदय
चीन से भारत आए थे कुषाण :- कुषाण वंश व अपने कुल में कनिष्क सर्वश्रेष्ठ सम्राट था. कनिष्क को राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी श्रेष्ठ शासक माना गया है, भारत में कुषाण साम्राज्य की स्थापना कुजुल कडफिसस या कडफिसस ने की थी. उसने लगभग 15 से 65 ईस्वी तक शासन किया, कुषाण असल में मध्य एशिया की यू-ची जाति की एक शाखा थी, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में पश्चिमी चीन में निवास करती थी मौर्यों के बाद के काल में भारत आने वाली कई जातियों जैसे यवन, शक व पहलव की तरह से कुषाण भी एक प्रमुख विदेशी जाति थी |
कुषाण वंश का उदय
रेशम मार्ग पर किया कब्जा :- कनिष्क शासनकाल में कुषाण साम्राज्य की वाणिज्य और व्यापार व्यवस्था बहुत उम्दा थी ये लगातार अपनी प्रगति पर बढ़ रही थी इसका एक प्रमुख कारण ये भी था कि उस समय पूर्व से पश्चिम की ओर होने वाला ज्यादातर व्यापार उन्हीं के राज्य से होकर किया जाता था. ज्यादातर व्यापारी चीन के रेशम मार्ग से होकर गुजरते थे, वहीं, हिंदुस्तान के उत्तर में ताजिकिस्तान और चीन सीमा पर हिंदुकुश पहाड़ियों तक कुषाण साम्राज्य फैला हुआ था. इसके अलावा कुषाण की सेना ने पूर्व में पामीर के दर्रों पर भी अपना कब्जा जमाया और वहां भारतीय कॉलोनी (उपनिवेश) बसाईं. यही मार्ग चीन को पश्चिम से जोड़ते थे. लिहाजा व्यापार के मामले में ये क्षेत्र बहुत ही महत्वपूर्ण थे |
कुषाण वंश का उदय
बौद्ध धर्म को संरक्षण :- कनिष्क के शासनकाल में हिंदुस्तान के चीन और अन्य देशों से व्यापार में वृद्धि हुई और विभिन्न संस्कृतियों का मिलन हुआ. उसी समय भारत सहित संपूर्ण एशिया में बौद्ध धर्म का प्रचार जोर-शोर से चल रहा था. ऐसे में कुषाण सम्राट रहते हुए कनिष्क ने बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया था, ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि कनिष्क ने कुंडलवन (जम्मू कश्मीर में श्रीनगर के पास हरवान) में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन कराया था. इसी संगीति में बौद्ध धर्म के अनुयायियों में दो फाड़ हो गए , बौद्धों की इस अंतिम संगीति के अध्यक्ष वासुमित्र और उपाध्यक्ष अश्वघोष थे अश्वघोष को कनिष्क के दरबार का राज कवि माना जाता है. बौद्ध विद्वान अश्वघोष को कनिष्क ने पाटलिपुत्र के राजा को युद्ध में हराकर आजाद कराया था, माना जाता है कि इसी संगीति में बौद्ध धर्म के प्रमुख और प्राचीनतम ग्रंथ त्रिपिटक पर टीकाएं लिखी गईं. इन्हें ‘महाविभाषा’ पुस्तक के रूप में संकलित किया गया इसी किताब को बौद्ध धर्म का ‘विश्व कोष’ कहा जाता है |

मुल्तान में बनाया सूर्य मंदिर :- कनिष्क ने वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर शहर में (पहले पुरुषपुर कहा जाता था) बौद्ध अवशेषों को संरक्षित कर एक विशाल स्तूप का निर्माण कराया था. हालांकि ये बौद्ध प्रतीक समय के साथ बर्बाद हो गया, लेकिन चीनी यात्री फाह्यान ने अपने दस्तावेजों में इस जगह का जिक्र किया है, इसके अलावा कनिष्क के शासनकाल में जारी किए गए सिक्कों पर बुद्ध के अलावा कई यूनानी, ईरानी और हिंदू देवी-देवताओं जैसे हेराक्लीज, सूर्य, शिव, अग्नि के चित्र खुदे हुए हैं, कुषाणों ने वर्तमान पाकिस्तान के मुल्तान में हिंदुस्तान के पहले सूर्य मंदिर की स्थापना की थी माना जाता है कि उस समय में मुल्तान का नाम काश्तपुर था, इतिहासकारों का मत है कि पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पहले के समय में मुल्तान को काश्तपुर, हंसपुर, बागपुर, सनाहपुर और फिर मुलस्थान कहा जाता था. जिसका नाम सूर्य को समर्पित मंदिर के नाम पर पड़ा था, वहीं, कहा ये भी जाता है कि कनिष्क ने भारत में भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय पूजा की शुरूआत की थी. कनिष्क के सिक्कों पर इसका प्रभाव देखा जा सकता है. बावजूद इसके ऐतिहासिक तथ्यों से कनिष्क के धर्म के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं चलता. हालांकि उसके शासनकाल के समय के सिक्कों पर कार्तिकेय के अन्य नाम जैसे विशाख, महासेना, स्कन्द आदि खुदे पाए गए हैं |

पामीर से लेकर कोंकण तक फैला था साम्राज्य :- ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि कनिष्क का साम्राज्य बंगाल और नेपाल तक फैला हुआ था, कनिष्क ने उत्तर-पश्चिम हिंदुस्तान में अरब सागर से लेकर सिंध सहित आज के पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक के विस्तृत भू भाग पर शासन किया था. कल्हण की रचना राजतरंगिणी और फारसी विद्वान् व लेखक अलबरुनी के साहित्य इस बात को प्रमाणित करते हैं, ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि कनिष्क के शासनकाल में कुषाण साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार पूर्व में पाटलिपुत्र से लकर पश्चिम में गुजरात की नर्मदा नदी व खुरासान तक और उत्तर में पामीर के पठार से लेकर दक्षिण में कोंकण तक था, वर्तमान हिंदुस्तान के अलावा कासगर, यारकंद, खोतान, हेरात, काबुल, गजनी, कंधार, सिस्तान, अफगानिस्तान और बलूचिस्तान भी कुषाण साम्राज्य के अंग थे, वहीं, कनिष्क ही वह प्रथम शासक था, जिसने उत्तर भारत के अलावा चीन के पश्चिमी क्षेत्रों को भी जीता था. हालांकि उसका शासन यहां स्थापित नहीं हो पाया, माना जाता है कि कनिष्क चीन के सम्राट की पुत्री पर अपना दिल हार बैठा था उसने राजा के सामने उसकी पुत्री से विवाह का भी प्रस्ताव रखा, लेकिन राजा ने उसे खारिज कर दिया ऐसे में क्रुद्ध होकर कनिष्क ने उस चीनी साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया, चीन की सेना काफी सशक्त थी, लिहाजा कनिष्क को हार का सामना करना पड़ा. हालांकि दूसरी बार कनिष्क ने बाजी मार ली चीन पर जीत तो दर्ज हो गई, लेकिन वहां कनिष्क अपना शासन स्थापित नहीं कर पाया. यहां से उसे ताशकंद, यारकंद और खोतान पर विजय अवश्य मिली माना जाता है कि 101 या 102 ई. में कनिष्क की मौत हो गई उसने कुल मिलाकर लगभग 23 साल तक कुषाण साम्राज्य पर शासन किया था |

आज हम इस पोस्ट के माध्म से लानोज घास के मैदान की संपूर्ण जानकारी इस पोस्ट के माध्यम से आपको मिल गई  अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगे तो आप इस पोस्ट को जरूर अपने दोस्तों के साथ शेयर करना

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