जंतु जगत का वर्गीकरण
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जंतु जगत का वर्गीकरण

वर्गिकी (Taxonomy) :- जन्तु विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं का नामकरण एवं वर्गीकरण (Classification) किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप सम्बन्धित जन्तुओं को एक निश्चित समूह में रखकर शेष जन्तुओं से पृथक किया जाता है, जन्तुओं के वैज्ञानिक वर्गीकरण का सर्वप्रथम प्रयास ग्रीक दार्शनिक अरस्तू (Aristotle) द्वारा किया गया। उन्होंने प्राकृतिक समानताओं एवं विषमताओं के आधार पर जन्तुओं को दो प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया |

ऐनैइमा (Anaima) :- इस समूह के जन्तुओं में लाल रुधिर का अभाव होता है। जैसे-स्पंज, निडेरिया (सीलेन्ट्रेटा), मोलस्का, आर्थोपोडा, इकाइनोडर्मेटा आदि अकशेरुकी जन्तु।
इनैइमा (Enaima) :- इस समूह के जन्तुओं में लाल रुधिर उपस्थित होता है। इस समूह में अरस्तू ने केवल कशेरुकी जन्तुओं को सम्मिलित किया और इन्हें निम्न दो उप समूहों में वर्गीकृत किया |
A) जरायुज (vivipara): इस उपसमूह के अन्तर्गत बच्चे जन्म देने वाले जन्तुओं को सम्मिलित किया गया, जैसे स्तनधारी जन्तु (पशु, मनुष्य एवं अन्य स्तनी)।

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B) अण्डयुज (Ovipara): इस उपसमूह के अन्तर्गत अण्डे देने वाले जन्तुओं को सम्मिलित किया गया, जैसे- मत्स्य, उभयचर, पक्षी, सरीसृप आदि। अरस्तू के लगभग 2000 वर्ष पश्चात 17वीं शताब्दी में जॉन रे (John Ray) ने सर्वप्रथम प्राणी जाति (species) की परिभाषा देकर विभिन्न जातियों का प्राकृतिक संरचनात्मक सम्बन्धों के आधार पर वर्गीकरण किया। जॉन रे के पश्चात् कैरोलस लिनियस (1735 ई.) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (systema Naturae) में 4236 ज्ञात जातियों को वर्गीकृत किया। इस पुस्तक के 10वें संस्करण (1758 ई.) में वर्गीकरण की जो प्रणाली अपनाई गई, उसी से आधुनिक वर्गीकरण प्रणाली (Modern classification system) की नींव पड़ीं। उन्होंने प्राणी जातियों के नामकरण हेतु एक द्विनाम पद्धति (Binomial nomenclature) का विकास किया। इस कारण कैरोलस लिनियस को आधुनिक वर्गीकरण का पिता (Father of modern taxonomy) कहा जाता है। 1901 ई. में अन्तर्राष्ट्रीय प्राणी जातियों के नामकरण हेतु कैरोलस लिनियस की द्विनाम पद्धति के ही अनुसार कुछ अन्तर्राष्ट्रीय नियमों को मान्यता प्रदान की गई जिससे कि प्रत्येक जाति का सम्पूर्ण विश्व में एक ही वैज्ञानिक नाम हो। इस अन्तर्राष्ट्रीय नियम में 1961 ई. में कुछ संशोधन भी किया गया। इस नियम के अनुसार प्रत्येक जाति के वैज्ञानिक नाम में वंश (Genus) का नाम बड़े अक्षर से तथा जाति (Species) का छोटे अक्षर से, परन्तु नाम तिरछे अक्षरों (Italics) में लिखा जाना चाहिए। यदि एक जाति के लिए विश्व के विभिन्न वैज्ञानिक विभिन्न नाम रख देते हैं तो सबसे पहले प्रयुक्त नाम को ही मान्यता प्रदान की जाती है।

प्राणी जगत को दो उप-जन्तु जगत में विभाजित किया गया है :- प्रोटिस्टा जगत (Kingdom Protista): इसके अंतर्गत सुकेन्द्रकीय एककोशिकीय (Eukaryotic Unicellular) जीव आते हैं। जैसे- प्रोटोजोआ संघ, मेटाजोआ जगत (Kingdom Metazoa): इसके अंतर्गत समस्त बहुकोशिकीय (Eukaryotic multicellular) जीव आते हैं। मेटाजोआ को पुनः तीन शाखाओं में विभाजित किया गया है। ये हैं- मीसोजोआ (Mesozoa), पैराजोआ (Parazoa) तथा यूमेटाजोआ (Eumetazoa)।

जंतुओं का वर्गीकरण (Classification of Animal Kingdom) :- विश्व भर में पायी जाने वाली असंख्य जीव जंतुओं की जातियों व प्रजातियों को अध्ययन व विश्लेषण के लिए कुछ भागों में बाँटा गया है। जीव जंतुओं की तमाम जातियों व प्रजातियों के प्रमुख लक्षण, विशेषताओं और उनमें भेद को उदाहरण सहित इस पोस्ट में समझाया गया है। संसार के समस्त जीव-जंतुओं को 10 वर्गों में विभाजित किया गया है। सभी एक कोशिकीय जीवों को एक ही संघ कार्डेटा में रखा गया है। जबकि बहुकोशिकीय जीवों को 9 संघों में विभाजित किया गया है।

प्रोटोजोआ संघ :- संसार में पाए जाने वाले समस्त एक कोशिकीय जीवों को इसी संघ में रखा गया है, इनका शरीर सिर्फ एक ही कोशिका का बना होता है, इनके जीवद्रव्य में एक या अनेक केन्द्रक पाए जाते हैं, इस संघ के सदस्य परजीवी और स्व जीवी दोनों प्रकार के होते हैं।

आर्थोपोडा संघ :- इनके पाद संधि-युक्त होते हैं, रुधिर परिसंचरण तंत्र खुले प्रकार से होता है।
इनकी देहगुहा हीमोसील कहलाती है, इनका श्वसन ट्रेकिया गिल्स, बुक लंग्स, सामान्य सतह आदि के माध्यम से होता है, प्रायः ये एकलिंगी होते हैं और निषेचन शरीर के अंदर होता है, उदाहरण – मक्खी, मच्छर, मधुमक्खी, टिड्डा, तिलचट्टा, खटमल, केकड़ा, झींगा मछली

मोलस्का संघ :- इन जंतुओं में श्वसन गिल्स या टिनीडिया से संपन्न होता है, इनमे सदैव कवच उपस्थित रहता है, आहार नाल पूरी तरह से विकसित रहती है, इस वर्ग के जीवों का रक्त रंगहीन होता है, इनमे उत्सर्जन वृक्कों के द्वारा होता है।

पोरिफेरा संघ :- इस संघ के जंतु खारे पानी में पाए जाने वाले जीव हैं, इनके शरीर पर असंख्य छिद्र पाए जाते हैं, ये जीव बहु कोशिकीय होते हैं, शरीर में एक गुहा (स्पंज गुहा) पायी जाती है, उदाहरण – स्पंज, साईकन, मायोनिया

प्लैटीहेल्मिन्थीज संघ :- इन जीवों में पाचन तंत्र विकसित नहीं होता, इनमे उत्सर्जन फ्लेम कोशिकाओं द्वारा होता है, इनमे कंकाल, श्वसन अंग, परिवहन अंग आदि की अनुपस्थिति होती है, ये उभयलिंगी जंतु होते हैं, उदाहरण – फीताकृमि, प्लेनेरिया

एस्केल्मिन्थीज संघ :- ये जीव एकलिंगी होते हैं, स्पष्ट आहार नाल एवं मुख व गुदा दोनों उपस्थित होते हैं, ये लम्बे, बेलनाकार व अखंडित कृमि होते हैं, इनमे उत्सर्जन प्रोटोनफ्रीडिया द्वारा होता है, उदाहरण – गोलकृमि जैसे – एस्केरिस, थ्रेडवर्म, वुचरेरिया

एनीलिडा संघ :- इनमे प्रचलन मुख्यतः काइटन की बनी सीटी द्वारा होता है, इनमे श्वसन सामान्यतः त्वचा के माध्यम से होता है परन्तु कुछ जंतुओं में क्लोम के द्वारा होता है, इनमे आहार नाल पूरी तरह से विकसित पायी जाती है, इनका रुधिर लाल होता है, इनका उत्सर्जी अंग वृक्क होता है, इस वर्ग के जीव एकलिंगी व उभयलिंगी दोनों होते हैं, उदाहरण – केंचुआ, जोंक

इकाइनोडर्मेटा संघ :- इस संघ के सभी जंतु समुद्री होते हैं, इनमे जल संवहन तंत्र पाया जाता है, तंत्रिका-तंत्र में मस्तिष्क विकसित नहीं होता, पुनरुत्पादन की विशेष क्षमता पायी जाती है।

सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata) :- इसके प्राणी जलीय द्विस्तरीय होते हैं, भोजन आदि पकड़ने हेतु मुँह के आस-पास धागे जैसी संरचना पायी जाती है, उदाहरण – हाइड्रा, जेलीफिश, मूँगा

कार्डेटा संघ :- ऊपर जो जंतुओं का वर्गीकरण (Classification of Animalia) दिया गया है, इससे सम्बंधित कई प्रकार के प्रश्न बनते हैं।

जंतु वर्गीकरण से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य :- हाइड्रा, जेलीफिश व मूंगा किस संघ के अंतर्गत आते हैं – सीलेण्ट्रेटा संघ, किस जंतु के जीवद्रव्य में हीमोग्लोबिन का विलय होता है – केंचुआ
केचुएं में कितने ह्रदय पाते जाते हैं – चार जोड़ी , काक्रोच के ह्रदय में कितने कक्ष होते हैं – 13 कक्ष , कीटों में कितने पाद होते हैं – 6, कीटों के कितने पंख होते हैं – चार , कौनसा सामाजिक जंतु श्रम विभाजन प्रदर्शित करता है – चींटी

सम्पूर्ण जीव जगत का वर्गीकरण – कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल :- पृथ्वी के जीवन काल को मुख्य चार युगों के आधार पर बाँटा गया है जिसमे सबसे प्राचीन पूर्व कैम्ब्रियन युग है। कैम्ब्रियन नाम कैम्ब्रिया के नाम पर पड़ा है चूँकी प्रथम बार इस युग के चट्टानों का विश्लेशण व खोज यहीं (कैम्ब्रिया वेल्स) मे हुआ था तो इस युग का नाम कैम्ब्रियन युग पड़ गया। पूर्व कैम्ब्रियन युग कैम्ब्रियन युग के पहले का है जिसको मुख्य रूप से दो खण्डों मे विभाजित किया गया है- (क) आर्कियोजोइक युग (निम्न पूर्व कैम्ब्रियन युग) (2,500,000,000-1,375,000,000) (ख) प्रोटेरोजोइक युग (उच्च पूर्व कैम्ब्रियन) (1,375,000,000- 850,000,000)- भारत मे विन्ध्य पर्वत श्रृँखला प्रोटेरोजोइक काल को प्रदर्शित करती है। इस काल मे प्रोटोजोआ व शैवालों का विकास हो चुका था। यदि जीवों के अध्ययन के विषय में बात की जाये तो यह पता चलता है कि जीवों को उनकी शारीरिक संरचना, स्वरूप व कार्य के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँटा गया है। जीवों का ये वर्गीकरण एक निश्चित पदानुक्रमित दृष्टि अर्थात् जगत, उपजगत, वर्ग, उपवर्ग, वंश व जाति के पदानुक्रम में किया जाता है। इसमें सबसे उच्च वर्ग जगत और सबसे निम्न वर्ग जाति होती है। अतः किसी भी जीव को छः वर्गों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। वर्गीकरण विज्ञान का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव का इतिहास। समझ बूझ होते ही मनुष्य ने आस पास के जंतुओं और पौधों को पहचानना तथा उनको नाम देना प्रारंभ किया। ग्रीस(ग्रीस) के अनेक प्राचीन विद्वान, विशेषत: हिपॉक्रेटीज, 46-377 ई. पू. ने और डिमॉक्रिटस 465-370 ई. पू., ने अपने अध्ययन में जंतुओं को स्थान दिया है। स्पष्ट रूप से अरस्तू 384-322 ई. पू. ने अपने समय के ज्ञान का उपयुक्त संकलन किया है। ऐरिस्टॉटल के उल्लेख में वर्गीकरण का प्रारंभ दिखाई पड़ता है। इनका मत है कि जंतु अपने रहन सहन के ढंग, स्वभाव और शारीरिक आकार के आधार पर पृथक् किए जा सकते हैं। इन्होंने पक्षी, मछली, ह्वेल, कीटआदि जंतुसमूहों का उल्लेख किया है और छोटे समूहों के लिए कोलियॉप्टेरा और डिप्टेरा आदि शब्दों का भी प्रयोग किया है। इस समय के वनस्पतिविद् अरस्तू विचारधारा से आगे थे। उन्होंने स्थानीय पौधों का सफल वर्गीकरण कर रखा था। ब्रनफेल्स 1530 ई. और बौहिन 1623 ई. पादप वर्गीकरण को सफल रास्ते पर लानेवाले वैज्ञानिक थे, परंतु जंतुओं का वर्गीकरण करनेवाले इस समय के विशेषज्ञ अब भी अरस्तू की विचारधारा के अंतर्गत कार्य कर रहे थे। कालांतर में लीनियस ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरा में सभी जीवधारियों को पादप व जंतु जगत में वर्गीकृत किया। लीनियस को आधुनिक वर्गीकरण प्रणाली का पिता कहा जाता है। शुरुआती दौर में यह प्रणाली द्वीजगत प्रणाली थी परन्तु 1969 ई. में व्हिटेकर ने पाँच जगत प्रणाली का प्रतिपादन किया। ये पाँच जगत निम्नलिखित हैं- मोनेरा जगत, प्रोटिस्टा जगत, कवक जगत, वनस्पति जगत, जीव जंतु जगत (चित्र देखें) आधुनिक वर्गीकरण के सारणी को निम्नलिखित रूप से देखा जा सकता है व यह भी समझा जा सकता है कि समय के साथ-साथ किस प्रकार जगत प्रणाली का विकास हुआ- 1. लीनियस (1735) द्वीजगत 2. हाइकेल (1866) त्रिजगत 3. चेट्टन (1925) चारजगत 4. व्हिटेकर (1969) पाँच जगत 5. वूइस व अन्य (1990) तीन डोमेन 6. कैवलियर स्मिथ (1998) छह जगत अन्तिम जगत को यदि देखा जाये तो ये मोनेरा जगत, प्रोटिस्टा जगत, कवक जगत, वनस्पति जगत, जीव जंतु जगत व छठा बैक्टेरिया जगत को जोड़ा गया है। बैक्टेरिया या जीवाणु को जीव जगत में बहुत बाद में जोड़ा गया, जीवाणु एक एककोशिकीय जीव है। इसका आकार कुछ मिलिमीटर तक ही होता है। इनकी आकृति गोल या मुक्त-चक्राकार से लेकर छड़, आदि आकार की हो सकती है। ये अकेन्द्रिक, कोशिका भित्तियुक्त, एककोशकीय सरल जीव हैं जो प्रायः सर्वत्र पाये जाते हैं। ये पृथ्वी पर मिट्टी में, अम्लीय गर्म जल-धाराओं में, नाभिकीय पदार्थों में, जल में, भू-पपड़ी में, यहां तक की कार्बनिक पदार्थों में तथा पौधौं एवं जन्तुओं के शरीर के भीतर भी पाये जाते हैं। वर्तमान समय में अन्तर्राष्ट्रीय नामकरण कोड द्वारा जीवों के वर्गीकरण की सात श्रेणियाँ (Ranks) पारिभाषित की गयी हैं। ये श्रेणियाँ हैं- जगत, संघ, वर्ग, गण, कुल, वंश तथा जाति। हाल के वर्षों में डोमेन नामक एक और स्तर प्रचलन में आया है जो जगत के रखा ऊपर है। किन्तु इसे अभी तक कोड में स्वीकृत नहीं किया गया है। लखनऊ के बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान में उपरोक्त दिये विषय पर गहन शोध कार्य होता है।

General Science Notes

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